Sunday, 12 February 2023

पृथक हो गई परिकल्पना पृथक पंथ का किया वरण

 

पृथक वरण

 

पृथक हो गई परिकल्पना पृथक पंथ का किया वरण

पृथक समस्याओं से परिचय हुआ पृथक ही पृथक चरण

 

पृथक कल्पनाओं में अनमन पृथक ही जीवन पृथक मरण

पृथक प्रवृत्ति पृथक प्रकृति पृथक द्वंद अन्तःकरण

 

पृथक स्मृति की कैसी कृति पृथक ही मनसपटल घूर्णन

पृथक यातना और वेदना पृथक मार्ग में पृथक गमन

 

पृथक ही षक्ति सिंचित भक्ति पृथक स्तुति पृथक भजन

पृथक आगमन पृथक पलायन पृथक ही भ्रमण लीन चरण

 

पृथक ही अक्षर और षब्द सब पृथक भाव और वियाकरण

पृथक रोग की पृथक औशधि पृथक ही चिंता चिंतित मन

 

पृथक पृथक सब करते करते पृथक हो गया सब आवरण

27/कोई किरण जगाकर जाये

 

अंबर में सूरज चककाय,े चंदा तारे टाॅक सजाये

हे ईष्वर तेरे इस जग को कोई किरण जगाकर जाये

 

सूरज जिसके ही कहने पर इस धरती पर समय गुजारे

चाॅंद चमकता चंचल हंसकर नभ के माथे टीका डारे

दिन और रात न लौटें बैंरंग कोई राह दिखाकर जाये

हे ईष्वर तेरे ,,,,,,,,,,,,,,

 

ढूॅंढ रहें है पंथ अपरिचि, कोई भी पदचिन्ह नहीं है

भेंट नहीं हो सका स्वयं से, वरना तुमसे भिन्न नहीं है

रीत नहीं है तो रच दो जो, तुमसे लगन लगाकर जाये

हे ईष्वर तेरे ,,,,,,,,,,,,,,,

षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन

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