कमल कह रहा है
नयी एक नजर से निहारो ये जीवन कमल कह रहा है संवारों ये जीवन
कहाॅं गर्भ मेरा कहाॅं पात मेंरे किसे देखकर खिल गया
मै सबेरे
जरा गौर से बस बिचारो ये जीवन कमल कह रहा,,,,,,,,,,
जहाॅं हॅंू वहाॅं से यहाॅ तक है दलदल बंधे पाॅंव मेंरे नहीं पा रहा चल
बिना सुख के संदेष हारों न जीवन कमल कह रहा ,,,,,,,,,
मेंरे पात पर रूक नहीं पाया कोई न सूरज सुखाया न पानी भिगोयी
नहीं व्यर्थ खो देना प्यारों ये जीवन कमल कह रहा,,,,,,,
नयी दृश्टि से तुम नयी सृश्टि देखो, नव नेह की हो रही वृश्टि देखो
कश्टों दुखों से उबारो ये जीवन कमल कह रहा है,,,,,,,,,
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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