रवि रष्मियाॅं भेजा जगाने
देखकर बेसुध जगत रवि रष्मिया भेजा जगाने
सकल सुंदर बाॅंसुरी व्याकुल विहल हैं बीन बनने
पीर संॅवरी देहरी में सुखों
का संवाद जनने
स्वयं वह चैतन्य आया द्वार
सबका खटखटाने
देखकर बेसुध,,,,,,,,,,,,,,
किरण के संदेष सारे फिर
तिमिर में घुल गये
जैसे व्याकुल आये थे ज्यादा
हो व्याकुल गये
समझाने को एक बात पर,
ना
समझने लाखो बहाने
देखकर बेसुध ,,,,,,,,,,,,,,
देखकर जडता रमें सोयी
षिथिल हो चेतना
जो न होनी थी उन्ही सारी
कथा की वेदना
फकीर पीर थके चले कोषिषों
में जड हिलाने
देखकर बेसुध ,,,,,,,,,,,,,
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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