वक्त के झीने से चादर में
वक्त केेे झीने से चादर में,साॅंसों की पैबंद है हम
कौन खींच दे कौन छुडा ले,नातेदारी किसे पता
अपना काम अदा करना है,
सबको
अपना जता-जता
जैसे चाहते गये बिखरते, भले बुरे से गंध हैं हम
वक्त के झीने ,,,,,,,,,,,,
रेषा-रेषा नहीं उधेडा,
अंदाजे
क्या पता चले
कैसा ताना-बाना था और,
कैसे
कैसे जता चले
माने बैठे हैं अंजाने,
खुद
को बडे बुलंद है हमू
वक्त के झीने,,,,,,,,,,,,,,,,,,
कभी उखडना कभी संभलना,
जूझ-जूझकर
घबराना
गर सूकुन का मिले कोई पल, नुक्ताचीनी का गाना
जागे न तो जमीर खुले,
ना
आॅंखे इतने बंद हैं हम
वक्त के झीने ,,,,,,,,,,,,,
है खामोष बनाने वाला,
बनने
वाले बोल रहे
बाॅंट-बाॅंटकर बाठ बनाकर, अलग तराने घोल रहे
नेक रहें तो उस अनंत के, सबसे अनुपम छंद हैं हम
वक्त के झीने ,,,,,,,,,,,,,,
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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