आ रही हॅंू पास तेरे
अंह का अंधियार तजकर फूंक से तेरे ही बजकर
होने से पहले अंधेरे आ रही हॅंू पास तेरे
नेह की बाती लगाकर प्राणों की ज्योति जगाकर
तोडकर दुनिया के घेरे आ रही हॅंू पास तेरे
कामनाओं को गिराकर वासना से मुख फिराकर
छोड दिन-राती के फेरे आ रही हॅंू पास तेरे
लांघकर हर देहरी को दुखकथा की वल्लरी को
मोलकर सब अंग मेंरे आ रही हॅंू पास तेरे
षब्द सारे करके स्वाहा डूबकर आनंद आहा
देंह छोडंे मन को हेरे आ रही हॅंू पास तेरे
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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