क्या जोडते हैं अगर जोडते है
धरा की विहलता,
गगन
की तरलता
चुप्पी लगा कर क्या बोलते हैं अगर बोलते है
बेसुध सी बिजली,
चपल
चित्त बिजली
साॅंवर गगन संग क्या जोडते हैं अगर जोडते है
हवा होके लम्पट,
उघाडे
जो घूंघट
बैरागीपन मे ये,
क्या
खोलते हैं अगर खोलते है
उड बनके धूली,चढ हॅंसके सूली
प्राणों में अनगढ,
क्यों
डोलते हैं अगर डोलते है
लुटे लुटके जागे,
मिटे
मौत माॅंगे
विधाता की रहमत,
क्या
घोलते हैं अगर घोलते है
बिपत बर्फबारी,
मनुज
की गंवारी
समय के तराजू,
क्या
तोलते हैं अगर तोलते हैं
न मिट्टी न सोना,
न
हंसना न रोना
टूटे खिलौने भी,
क्या
मोलते हैं अगर मोलते है ।
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