मेरी कोषिषों को वो उम्मीद से निहारता
घेरता है अदृष्य को और दृष्य सारे संवारता
लौ से बाती जोंडता और दीप वो है बारता
कोषिषे ना हार जायें ,
इसलिए
रखता नजर
वन-विरानों में पायदानों वो बाठ-बाठ है डारता
एक कदम गर मै चलूॅं वो सौ कदम आता है चल
मेरे होने को वो देखो खुद से ही है गुजारता
मै तो हारी उनके आॅंखी में दिखी है हार पर
कोषिषों को वो मेरी उम्मीद से है निहारता
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
No comments:
Post a Comment