उम्मीद एक दिन टल गया
षून्य में वह सार दीपक जल गया
देंह का आकार आखिर फल गया
ओस की जब बूॅंद मचली प्रेम में
सूर्य का अभिमान सारा गल गया
आज का दिन दे गया भारी सूकुन
कम से कम उम्मीद एक दिन टल गया
प्रष्न बस सारे खडा किये वो सामने
ढूढने जो समस्या का हल गया
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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