आषा कभी न कोश भरे
आषा जाग तभी होवे मृत,भरे निराषा आषा
आश्रित
आषा अभिनय होष करे,आषा कभी न कोश भरे,,,,,,,,,,,,,,
आषा एक अधार अधर्मी,
आस
उपासक सकल अकर्मी
आषा सब पर दोश मढे,
आषा
कभी न कोश भरे ,,,,,,,,,,,,,,,,
आषा रूश्ठ सदा सदा सत,
आषा
भ्रम भय और चिंतारत्
आषा संग निर्दोश मरे,
आषा
कभी न कोश भरे,,,,,,,,,,,,,,
आषा का आकार वृहदतर,
आषा
का झूठा हर आदर
आषा कटता पोश करे,
आषा
कभी न कोश भरे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
सब असार आस के संगी,
बहुरूपिया
विकृत बहुरंगी
आषा बिन जलकोश तरे,
आषा
कभी न कोश भरे,,,,,,,,,,,,,,
आषा फूॅंक फूॅंक चित्तवंषी, करे निराषा को निरंबंसी
आषा सुख जयघोंश करे,
आषा
कभी न कोश भरे,,,,,,,,,,,,,
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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