Sunday, 12 February 2023

आषा कभी न कोश भरे

 

आषा कभी न कोश भरे

 

आषा जाग तभी होवे मृत,भरे निराषा आषा आश्रित

आषा अभिनय होष करे,आषा कभी न कोश भरे,,,,,,,,,,,,,,

 

आषा एक अधार अधर्मी, आस उपासक सकल अकर्मी

आषा सब पर दोश मढे, आषा कभी न कोश भरे ,,,,,,,,,,,,,,,,

 

आषा रूश्ठ सदा सदा सत, आषा भ्रम भय और चिंतारत्

आषा संग निर्दोश मरे, आषा कभी न कोश भरे,,,,,,,,,,,,,,

 

आषा का आकार वृहदतर, आषा का झूठा हर आदर

आषा कटता पोश करे, आषा कभी न कोश भरे,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

 

सब असार आस के संगी, बहुरूपिया विकृत बहुरंगी

आषा बिन जलकोश तरे, आषा कभी न कोश भरे,,,,,,,,,,,,,,

 

 

आषा फूॅंक फूॅंक चित्तवंषी, करे निराषा को निरंबंसी

आषा सुख जयघोंश करे, आषा कभी न कोश भरे,,,,,,,,,,,,,

 

षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन

 

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