गीतों को बोंती जा रहीं
मन लहरी को प्राणघाट,
सम्पूर्ण
डुबोती जा रही
मैं रही अब मैं कहाॅं,
मैं
तो तुम होती जा रही
घेर रहा है पाष प्रलय का, जन्म है आखिर नाष प्रणय का
दुख ही है सम्मोहन भय का, नहीं होई वरदान अभय का
इसीलिए निजहित ही मैं,
गीतों
को बोंती जा रही ।
मैं रही अब मैं
कहाॅं,,,,,,,,
प्रष्न सहीं है अनुचित है हल, दुख है सहज स्वभाव है तरल
क्या अमृतमय और गरल,
जग
सारा का सारा पागल
बंटो न बाॅंटो यह कहते, अविरल ज्योति है जा रही
मैं रही अब मैं कहाॅ,,,,,,,,,,,,
जब सुमिरन पाथेय मिला,
व्याकुलता
को सदय मिला
जबसे वह र्निद्वद छुआ,
बरसा
है अब मद महुआ
साॅसे तेरी साॅंसों में, अपनी पिरोती जा रही
मैं रही अब मै कहाॅं ,,,,,,,,
सघन हो गया साध जो तेरा, चेतनता ने तब डेरा डाला
चित्त पटल चेहरा उकेरा, घुला धुला मेरापन मेंरा
लगन जगा गहनतम तुममे,
अपने
को खोती जा रही
मैं रही अब मैं कहाॅं ,,,,,,,,,,
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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