क्या बाॅंटा तूने पागल
हवा बाॅंटती रही जिंदगी साॅंसों में घुलकर मिलकर
नदी बाॅंटती चली जा रही सबको पी के पथ चलकर
मिट्टी गलती करे उन्हें भी गले लगाती है गलकर
अनल बाॅंटता तपन अनोखा अपने में खुद ही जलकर
बाॅंट रहा है गगन दूर से रिमझिम बॅंूदों में ढलकर
बाॅंट रहे सब अपनी लगन में क्या बाॅंटा पागलपन कर ।
षुभचन्द्रसूर्या षोभामोहन
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