Sunday, 12 February 2023

मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा

 

मैं तृषित मृगा विस्मृत अपरा

 

तुम विभावसु अर्चित षुभफल प्रांगण-प्रांगण षुभ तुलसीदल

हृदकोश अपरिमित परम अतल मैं एक असिंचित क्षुब्ध धरा

मैं तृशित मृगा ,,,,,,,,,,,,,,,,

 

तुम अर्थित आवाहित आगम अवग्राही राही पथ परम

गमन पंथी अवेल अगम मैं ष्वासों की पथ हॅंू अधरा

मैं तृशित मृगा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

 

वो हैं अनुनादित मधुरनाद  षांतिप्रदायक तम विशाद

विष्वंभर के पावन प्रसाद मैं नववधु अलकों की गजरा

मैं तृशित मृगा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

 

वो प्राची गोधुलि के वंदन सुरभित केसर संदल के वन

स्मरण योग्य प्रतिपल प्रतिक्षण मैं नयनों से बिखरी कजरा

मैं तृशित मृगा,,,,,,,,,,,,,,,,,,

 

सुख उदित करें षुभ युगल चरण ना वृथा जन्म न तो वृथा मरण

मन व्योम वृहद तन मृदु कंचन मैं मरूथल मिथ्या मृग लहरा

मैं तृशित मृगा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

 

वो तो है सुवासित षुभ सुगंध भाशित भाशा तन भाव बंध

प्रेमिल प्रलाप के महानंद मैं मैं तू कर बढती झगडा

मैं तृशित मृगा,,,,,,,,,,,,,,,,,,


शुभ्चन्द्रसुर्य शोभामोहन 

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