भाव लहरा (मत्तगयन्द सवैया)
(१)
भीतर सेज सुते रसिया अउ,
पापिन झाल न पावँव पंखा ।
भूल पिया घर काज जिहावँव,
आगर के उपजै मन शंका ।
मार डरै डर लाज जरै जग,
राउर द्वार रहौं बन रंका ।
रेंगन चाहँव संग महूँ पर,
हौं जस पाट नदी कर अंका ।
(२)
हा बिरथा जिनगी अब लागत,
कोन मिटाहय माथ कलंका ।
बाट बनावँत जावँव पी कत,
बोरझरी अरझौं अरझंका ।
लोक तिनो अउ चौदह भूवन,
बाजत हे रसिया कर डंका ।
राघव ले बिछड़े सिय लागत,
प्रान बियाकुल कंचन लंका ।
शोभामोहन श्रीवास्तव
दिनांक ०९/०५/२०२०
रायपुर छ.ग.
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