छत्तीसगढ़ी निरगुनिया भजन
देह असत हे सत हे अंतस
देह असत हे सत हे अंतस ।
मन के छाँदनडोरी बरकस ।।
जहर जगत में भीतर मधुरस।
देह असत हे सत हे अंतस ।।
मांस मूत मल गठरी चोला ।
महामोह जेकर बर तोला ।।
दाँव लगाये हावस सरबस ।
देह असत हे सत हे अंतस ।।
काल गाल में सबो समाथे ।
चतुरा मूरख सबो झपाथे ।।
कर अगवानी बेरा हँस हँस ।
देह असत हे सत हे अंतस ।।
डर मा साँप जनावत डोरी ।
बाँचे ड उल लगावत कोरी ।।
डर छूटे ले खेल असन बस।
देह असत हे सत हे अंतस ।।
धरा बँधा के जब जग आथे ।
तब तब कतका रोथे गाथे ।।
फेर भुला के अउ जाथे रस ।।
देह असत हे सत हे अंतस ।।
गिंजर घुमर चौथापन आथे ।
जीब जगत के खेल भुलाथे।।
लाग नता सब ला भूले कस ।
देह असत हे सत हे अंसत ।।
फिरही धर मानस गुन आगी ।
गगन महल चरही अनुरागी ।।
जबतक नइ होही जस के तस।
देह असत हे सत हे अंतस ।।
शोभामोहन
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