मनचाहे जब मिल नइ पाही ।
अनचाहे हर आगू आही ।।
रोग कभू जब जीव दुखाही।
औसध तन के रोग मिटाही ।।
मन के दुख अउ कब दुरिहाही ।।
ज्ञान खुराक जभे अभराही ।।
ज्ञान बिगन सुख नहीं जनाही।
अटकर करही जइसे पाही ।।
जीव दया जेने ला भाही ।
उचित करम पुन जोरत जाही ।।
जप तप साधन ले अकताही ।
हरहिन्छा मन पुन सिरजाही ।।
सत के रद्दा धरके जाना ।।
बिकट कठिन जग डगर सुजाना।।
ईश बिना जग हो नइ पावै ।
वो जानै जेला जनवावै ।।
अपन भगत के भाग जगाही।
ईश्वर आगर डउल लगाही ।।
ज्ञान मिलै जेकर परसादे ।
आदर देके माथ नवा दे ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०५/०५/२०२०
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