निकलत निकलत देरी होही
निकलत-निकलत देरी होही,
अड़चन घेरी-बेरी होही।
अटके-सटके मा सपड़ाये
बनिया तो नौ सेरी होही ।।
निकलत निकलत देरी होही.........
सतहा ला पतियाय न कोनो,
लबरा डहर कछेरी होही ।।
जीव जगत मा अइसन लागत,
निठुर कसइया छेरी होही ।।
निकलत निकलत देरी होही.........
शोभामोहन श्रीवास्तव
०५/०५/२०२०
दिन-मंगलवार
स्थान खुश्बूविहार
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