सबो छोड़के साँस-साँस मन, हरिगुन गाना रे
अउ कोनो मग कहूँ बताथे, झन पतिया ना रे ।।
छोड़-छाँड़ के सब हुसियारी ।
लाग-नता गोती लगवारी ।।
खीख परे काया के गढ़ ला, भज उजरा ना रे।
सबो छोड़के साँस-साँस मन, हरिगुन गाना रे ।
चलत-फिरत जग करत गुजारा।
प्रभु गुन कीर्तन भजन अजारा ।।
साधन नर-तन पाके सुमरत, भव तर जाना रे ।
सबो छोड़के साँस-साँस मन, हरिगुन गाना रे ।
साँसा डोरी नाम मोतिया।
भजत-भजत जल जही जोतिया।।
चौरासी चक्कर नहकत द्युत लोक समा ना रे ।
सबो छोड़के साँस-साँस मन, हरिगुन गाना रे ।
कतको बड़का राजा राठी।
सबो मिंझरथे एक दिन माटी ।।
प्रभु ला साधे अलग डार मा,पिकरी पकाना रे।
सबो छोड़के साँस-साँस मन, हरिगुन गाना रे ।
शोभामोहन मगन भजन हे।
लाग नता बस एक सजन हे।।
भजन बिगन नइ हे चोला के, कुछु ठिकाना रे।
सबो छोड़के साँस-साँस मन, हरिगुन गा ना रे ।।
शोभामोहन
१६-०१/२०२०
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