जहाँ किसन के बंँसी बाजत
आल्हा छंद रास
जहाँ किसन के बंँसी बाजत
बार न बाँधत गोपी ग्वाल
रास रंग रंझाझर झुमरे,
दिये नेवता जब नंदलाल।।
आँखी चमकत मिरगी जइसे
अमरित टपकत बोली बात ।
सुध-बुध सबो भुलाये तन के,
रेंगत हें मन मन मुस्कात।।
सँभर सँभर घर घर ले निकलत,
रास रचाये आधा रात ।।
एक बरन सुंदरी रूपसी
एक्के गोत व एक्के जात।।
आधा डर अउ आधा बल मा,
घर-घर ले निकलत ब्रजनार।
गोड़ मड़ावत सँभल-सँभल के,
तभो करत पैजन झंकार ।।
दल के दल वृन्दावन कोती,
चलत हवँय धर संगी हाथ ।
करत अगोरा बइठे हावय,
जिहाँ चराचर जग के नाथ ।।
शोभामोहन
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