चल न गड़ी वृन्दावन जाबो.......
चल न गड़ी वृन्दावन जाबो,
कान्हा रास रचाथे रे ।
सब रउताइन मन अधरतिया,
सँभर-सँभर के जाथे रे।। चल न गड़ी ....
नंदराय के बने पहटिया,
दिनभर गाय चराथे रे ।
साँझ होत बरदी उसला के,
जमुना घाट नहाथे रे ।। चल न गड़ी .......
फेंक भँदइ लउठी अउ खुमरी,
महाराज बन जाथे रे ।
चंदन तिलक लगाथे माथा,
कद पिंवरी झमकाथे रे ।। चल न गड़ी ....
कनिहा करधन कसे काछनी ,
सोना ढ़ीक सुहाथे रे ।।
खाँध धरे पट पीताम्बर ला,
रहि-रहिके लहराथे रे ।। चल न गड़ी........
मछरी छाप पहिरथे कुंडल,
मउर मकुट खपवाथे रे ।
छाती भर बैजंतीमाला,
मोती लर लटकाथे रे ।। चल न गड़ी............
अत्तर छींचे आनी-बानी,
महर-महर ममहाथे रे।
मोर पंख ला मूड़ सजाके,
बँसुरी नीक बजाथे रे ।। चल न गड़ी........
सुनके दरसन प्यास बढ़त हे,
जाथें तेन बताथे रे ।
भाग जागथे जेकर मनके,
तेने दरसन पाथे रे ।। चल न गड़ी ..........
सब गोपी के साध पुरोये,
अनगिन ठन बन जाथे रे ।।
रास रंग रंझाझर झुमरत,
बेर पहाती आथें रे ।। चल न गड़ी............
ए गड़ी चल वृंदावन जाबो,
बात महू ला भाथे रे।
शोभामोहन के रंगरसिया,
पिया सबो सहराथे रे ।। चल न गड़ी.........
शोभामोहन
१२/०१/२०२०
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