Tuesday, 21 July 2020

तू और मैं हैं सग री कविता
कोमल आखर बदन कलश में,
भाव प्राण जगमग री कविता ।
कोकिल का मधुगुंँजन बनकर,
चल अमराई मग री कविता ।।
जग रीतो की साँकल बेड़ी,
लांँघ रही है आज अकेली ।
निज चिंतन के बीज उगाने,
निकली औ सौ-सौ दुख झेली ।।
नवल दीप जग आंँगन रखने,
हर तूफांँ संग झगरी कविता ।
शब्दों ने रख लाज किनारे,
भावों पर यूँ डोरा डाला ।
झरे गीत बन सांँस-सांँस से,
जब से थोड़ा होश संभाला ।।
सूरज संँग पगफेरा करके,
किरणों के संँग संचरी कविता ।
कोई ऐसा नहीं राग में,
जिसे रिझा ले औ फिर पा ले ।
जोड़े जो अनुराग पिया से,
बस ऐसे गीतों को गा ले ।।
सधे पाँव इस विकट गांँव में,
रखना एक-एक पग री कविता ।
अपने कोरेपन को उनके,
रंगों में सादर कर अरपन ।
रहना सदा सुहागिन जाओ,
अब ना गाना बिरहा तड़पन ।।
पी से लगन लगाना है तो,
दुलहिन जैसी लग री कविता ।
पाहुन बन आना उर आंँगन,
हर मौसम का रस बरसाने ।
दबे पांँव कुछ ऐसे चलते,
बस मैं जानू और तू जाने ।।
कभी रूठ मुझ छंदप्रिया से,
होना नहीं विलग री कविता ।
तू बस जाने बात हृदय की,
बुद्धि चलाती दुनियादारी ।
लोग चांँद पर आते-जाते,
तू अरझी आँचल महतारी ।।
खट ना सकेगी पट ना सकेगी,
जग की रीत अलग री कविता ।
तू चलती जिस बाट बावरी,
नातेदार कहांँ होते हैं ।
तूं जागन की रटन लगाती,
लोग जहांँ बेसुध सोते हैं ।।
यह सोया जग सौतेला है,
तू और मैं है सग री कविता ।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
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