Tuesday, 21 July 2020

कज्जल छन्द (14-14)*
14/14 मात्रा के 4 चरण वाले समपाद मात्रिक छन्द आय.
बेरा निंदरत अउ परात
बिलमत नहीं न सुनत बात,
परघाये ले मुँह बनात,
रेंगत अपने सुर म जात ।
बेरा छेंके बर सधाय,
मोह परे जन दुख ल पाय,
मोह उपज के दुख बियाय ,
मनखे कुछ समझ नइ पाय ।
मोह नार मा फदक हाय,
बिरथा होवत जनम जाय।
जीयत भरम गरी फँदाय,
उबरे बर न डउल लगाय ।।
शोभामोहन

No comments:

Post a Comment

संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...