सार बात ले दूरिहा जात आल्हा
1/
घाम नेवतत हे लखटकिया, ररुहाँ छाँव उवाटत जात ।
अपन गरज ला जम्मो जोमत, पर के दुख नइ मन टघलात ।।
2/
खंड़ित मंडित करके पंडित, पोथी पतरा बाँच बतात ।
फोकट ग्यान बघारत हावय, सार बात ले दूरिहा जात।।
3/
मनखे के हुसियारी देखव, जानत नइ तेला अरथात ।
खसलत उम्मर रचड़ावत तन, काया माया देह चलात ।
4/
चक्करभँउरी मन नइ छोंड़त, सार फोकला समझ न आत ।
रेंगत बोलत-चालत हाँसत, फेर न जानै कोन चलात ।।
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