छूटगे हे रंगरेली,रंग छूटत देख के ।
मन चलत हे अब जगत मा, देह माटी लेख के
लेग दे ओ पार माँझी,लेग दे ओ पार रे।
दूरिहा बड़ दूरिहा चल,नइ जिहाँ संसार रे।।
रीस दुख-सुख साध लहरा,के भयंकर हे नदी।
मैं गोड़ मा तब, बीतही कतको सदी ।
तोर ले हावय भरोसा,नाहके भव खार रे।
लेग दे ओ पार माँझी,लेग दे ओ पार रे।।
प्रान के बाती सजा के,एक दियना बारहूँ ।
संग तँय देबे तभे तो,सबो अलहन टारहूँ ।।
हे बिकट लहरा उठत अउ,हँव परे मझधार रे ।
लेग दे ओ पार माँझी,लेग दे ओ पार रे ।
शोभामोहन
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