जानथस पतझर लुकाये हे बसंती बाग के
आय हे संसार मा वो, एक दिन जाही घलो
एक भाँवर घूम फिरके,बहुर के आही घलो ।
जीव दँउरी मा फँदाये, बात गुनिया जान।
ज्ञान के उजियार धरके,जीव ला सुख सानथे।।
जानथस पतझर लुकाये, हे बसंती बाग के।
जीव रखके शिव जी ले, रहत बेरा जाग के।।
आसरा के ढ़ेखरा में, साध ला छछला नहीं ।
खोजबे सुख ला जगत मा,हो जबे तब तो बही।।
कोन हर मेटे सके हे, बरमलेखा भाग के।
जानथस पतझर लुकाये, हे बसंती बाग के।
शोभामोहन
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