हरि के छाती भृगु के लात
(मनहरण घनाक्षरी)
(१)
जगहित करे बर, जग्य रचाये सुघर,
देवदल संसो मा बिकट बूड़े रहिथे ।
फल अरपन करे, ब्रम्हा हरि हर वरे,
रिखि भृगु हा नियाव करे जोग लहिथे ।।
शेषनाग के उपर, सुते रहै हरि हर,
देख के अहँजथस रिखि भृगु कहिथे ।
आगी अँगरा असन, रीस लागिस बढ़न,
रिखि छाती मारे लात हरि अउ सहिथे ।
(२)
फूल कस गोड़ तोर, बज्र कस छाती मोर,
बिनय बचन कहे हरि गोड़ धरथे।
सुन गोठ मया सने, भृगु सुख पाये बने,
जग्य फल देये तब रिखिवर करथे ।
सुन लछमी रिसाय, छतिया मोला बसाय,
कोन छाती लात मारे घेपै नइ डरथे ।
लछमी करत लख, रखमख रखमख,
शोभामोहन बिसनु लोक ले निकरथे ।
शोभामोहन श्रीवास्तव
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