Tuesday, 21 July 2020

सब्बो दोहा ठीहा
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
जस बघवा पीला अपन, करे शिकार सिखात।
तस गुरुजन मन हर हमर, छंद मरम जनवात।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
चेते तेने चेत हा, प्रभु में चेत लगात ।
अउ अचेत हर हाथ में, दुख बियात पछतात ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
टुप ले जाये साध तौ,कर एके ठन कामकाम ।
तन चाहे कुछ भी करय,जपत रहव मन राम।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★रंग भंग ला घोर के, होली परब मनाव ।
भंग परे झन रंग में, यहू उदिम लगाव ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
चिक्कन चाँदन घर रखय, आनी बानी राँध ।
ओ नारी परिवार ला, बिन डोरी लय बाँध ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
ठठर ठठर हो ठेठरी, सेंकव बने करेर ।
खाये बर देखत सबो, झटकुन लानव हेर।। ◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
पर के झन गिन भोरहा ,अपन ऐब ला जान।
गुन जोरे बर सीख जा,होये बर गुनवान ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★
मन के मइल न छूटही, कतको साबुन घोर।
फरी करे बर होय तब,राम रसा मन बोर।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
उजबक मन के राज में, गुनधर माँगे भीख।
मुरुख मान पावय अबड़, बूता कर के खीख।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
परे धराही जीव ला, लहुटे आपन गाँव।
घाम जियानत हे अबड़, खोजत हे जूड़ छाँव।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
भजन छोड़ सब कुछ करे, होगे बेरा जाय ।
जम बाजा बाजत हवय, पोंटा काँपत हाय।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
खावत पहिरत अउ सुतत, बेरा खरचत लोग।
सुमिरन साधन छोड़के, हे मलोत भवरोग।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
चोला गढ़ कैदी बने, माया फाँदा पाँव ।।
परे धराही जीव ला, लहुटे बर घर गाँव।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
तन धँधनी खोली असन,मया ह फांँदा ताय।
परे धराही जीव ला,तेकर सेती जाय ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
कोनो काँटा बाठ में,रखथे कोनो फूल ।
तिरिया पर उपकार कर, जाथे हरदिन भूल।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
पर के भोरहा खोजना, ठउका नोहय जान।
गुन जोरे बर सीखबे,तब होही गुनगान ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
पिचकारी में रंग भर, मारत हे ब्रजलाल ।
राधा रानी भींज के , होवत हरियर लाल ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
दू दिन में छूट जाय ए, फागुन के सब रंग ।
राम रंग रंग जा गड़ी , कभू न छूटे संग।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
पंख लगा मनखे उड़त, चन्द्र लोक फिर आय ।
अउ परोस के बात ला, खबर गजट करवाय ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
कइसे लीला राम के , कइसे हे सब काम ।
हाथ बात सब ओकरे, अउ मनखे के नाम ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
गोठ अबड़ कमती मया, बैर भाव बइहाय ।
ये मनखे के जात हर , कइसे होगे हाय ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
जस पानी थीर हो जथे, समा समुंद गहीर ।
तस मनखे मन थीर हो, जाय मयारुक तीर ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
पानी हर खोजत फिरय, रहे बसे बर गाँव ।
दहरा दिख जाथे जहाँ , बसथे तेने ठाँव ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
आगी के लपटा उठे,हाहाकार मचाय।
राखसात सबला करे,माँझ जेन हर आय।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
बनन बनन खोजत सबो,मया मयारुक गाँव।
खोजत खोजत में मिलय,फेर ये दुर्लभ छाँव।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
थीर होय के साध में, पानी रेंगत जाय ।
दहरा कोती जाय अउ, समुंद सुते सुख पाय ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
जस पानी हर खोजथे,रहे बसे बर ठाँव ।
तस मनखे खोजे सदा, मया दया के छाँव ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
अंतस मनखे जात के ,परगे अतेक बिमार ।
गीता धर के हाथ में ,बोलत झूठ हजार ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सत के धजा धरे धरे, जे मनखे मर जाय।
देस राज इतिहास में,नाम अमर कर जाय।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
कूची तारा ले कहत, अब कब मिलबो हाय ।
तारा कहिथे धीर धर, बिरहा मया गढ़ाय ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सब में उही बिराज के,सिरजय अउ नसाय।
अइसन अजगुत बात ला,जान न कोनो पाय ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
तरी डहर पानी चले,आगी ऊपर जाय।
पवन चलय चारो डहर, तइसे मन तक धाय।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
जग माया अरझे रहे,वो हर भंउरी खाय ।
प्रभु नाम अरझे रहय,भवसागर तर जाय।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
माया फदके जी ला,भजन लगावय पार ।
अतके नानुक बात हर,सबो ग्रंथ के सार।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
मया दया धरमी रखे , सब बर एक समान।
धरम बाठ रेंगत रहय, पाये बर भगवान ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
★★★★★★★★★★★★★★★★★
जग अथाह दहरा सहीं, तन ड़ोगा बीच धार ।
मया लगा सुमिरन करौं, होये बर भव पार ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
घाम घरी आगे हवय, साग न एक सुहाय ।
चक अम्मट कड़ही बने, इड़हर भर मन भाय ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
उरीद पीठी सान के , कोंवर कोचइ पान ।
इड़हर कड़ही राँध ले, अबड़ सुहाथे जान ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सरसों मेथी व मिरचा, उपकउ फोरन डार ।
घोर घार बेसन दही, इड़हर करौ तियार ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
पथरा ला मूड़ी नवा,मात पिता लतियाय
अइसन उजबक लोग ला,बेर सबक सिखलाय
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
जनकवि कोदू राम जी,दलित हवय उपनाम।
जन भाखा में छंद रच,अमर करे निजनाम ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
छत्तीसगढ़ी छंद के, पुरखा पुरुख सुजान।
कोदू राम दलित रचे, भाव बोहात बिधान ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
छंदकार जनकवि दलित,कर जन मन के बात ।
कुल उजास कर दिस अपन,छंद छटा बगरात।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
जनकवि के कुल कीर्ति में, करत जबर विस्तार ।
कुलदीपक हे छंदविद , निगम अरूण कुमार ।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
जनकवि के कुल कीर्ति में,करत जबर बढ़वार ।
अरुण निगम गुरुवर हमर,बना छंद परिवार ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
छत्तीसगढ़ी ला करे ,अवधी ब्रज संग ठाढ़ ।
अरुण निगम जी हे अड़े,भाखा हित गुन काढ़ ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
जस अनगढ़ पथरा परे, मूर्ति बनै सहि घात ।
तस गुरुवर गुनग्राहक, छंदकार कहलात ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
धान बोंय ले धान हो , काँदी बन बिन बोंय ।
तस मन धनहा बिन भजन,कचरा कूहा होय ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
हीरा कस साँसा लुटा, कचरा मोल न लेंव ।
राम रमे जिनगी पहा, रेंगौं छेंवे छेंव ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
महादेव हरहर कहँव, सकल लोक के नाथ ।
उमा सदा डेरी डहर, रहे छाँव कस साथ ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
राम छोड़ के जीव बर,करै न कोनो सोग।
तेकर सेती भूल जा,का कहिथे जग लोग।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
मन भीतर ईश्वर बसा,टरही सब दुख दोख।
तब माया के रूख के,ठाठा परही कोख ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
कोन अपन हे जगत में,अउ हे कोन बिरान।
काया गढ़ पंचमिझरा,सबके एक मिलान ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सुन सियान के बात ला,अउ गठान धर बाँध।
बन सुजान सुख भोगबे,हो जाही हरु खाँध।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
गरू लगे दाई ददा, नीक लगै लगवार ।
मनखे उल्टा रेंगथे, नीत ला चूल्हा डार ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
आँखी फूटत देख के, पर के सुख संजोग ।
कहत लगै जे हर कभू, कइसन होवत लोग ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
अँखमूँदा जेने उपर , करत भरोसा भार ।
घरलेवा बन एक दिन, आँखी देवय उघार ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सब अनाथ के नाथ हे, फकत एक भगवान ।
राम भजन भर सार हे ,बिरथा ये जग जान ।। ◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
कोन अपन हे जगत में , अउ हे कोन बिरान ।
पाँच जिनीस के सब रचे, सबके एक घरान ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★
परे धराही जीव ला, लहुटे बर निज छाँव ।
भव अपार बंधन जरै, बेड़ी डारय पाँव ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
बेरा बिछलत हाथ ले, चोला बनिस गुलाम ।
कभू सोर लेबे पिया,गुन के सुमिरँव नाम ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
तँय अमोह दहरा प्रभु, अउ मैं हर एक बूँद ।
काबर बिलगा दे हवस, महू ल मेल समुंद ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
रहस महल रच ऊँचहा ,अउ डुब्बुल मन तोर ।
अपन तुपन के रंग ला, लुका रखे हस घोर ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
गुनै फेर उरथी करै, वह जन होय सुजान ।
काज बनय उँकरे सबो,जग में होवय मान ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
घर जाये के साध तव,डउल करत रह रोज ।
जे खोजे ते पाय हे ,रस्ता मिलही खोज ।। ◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★
जेन चीज बउरे कभू, बिगन चुकाये मोल ।
कर्जा हावय जान ले , लेही मुँह खखोल ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★
जे दिन होही जान रे ,डर ले बड़का टेक।
कोनो बिपदा गोड़ ला, फेर न पाही छेंक ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★
आगी बारे नइ सकय,पानी नहीं भिंजोय।
अंतस आरुग ही रहय,हवा न सकय सुखोय ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
घट घट में भगवान हे,सबमे ओला लेख ।
उबरे जे जन गरब ले,सउँहत पावय देख।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
घट घट में भगवान हे,सबमे ओला देख।
गरब भाव ला छोड़ दे, सब ला बने सरेख।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
बेरा मा मनखे भले,जानय अउ पतियाय ।
ईश्वर गुरु अउ जीव हर,नास नहीं हो पाय।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★
राम रंग में बूड जा, सब बड़हर सुख पाय ।
संगी साथी छूटथे,वो भर साथ निभाय ।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
तीन तिलिक के नाथ तैं, मैं चेरी बरजोर।
मोर नहीं पत राखबे , होही हाँसी तोर ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★
मनुख जनम में कट सकत, घन अंधेरीपाख। जनम मरन के खेल में, जोनि घूमरत लाख।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
मनखे बेरा में भले , जानय अउ पतियाय
ईश्वर गुरु अउ जीव हर,फेर न कभू नसाय।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
गुनत रहे ले दूरिहा, भाव भजन ले तीर ।
कण कण में संचरे हवय, अइसे प्रभु रघुवीर।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
ढ़मढ़म कर न देखाय ला,दियना बाती बार।
बाहिर बुगबुग ले हवय,घुपघुप मन अंधियार ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★
खारराख हे नाम हर, मन ला कर अंजोर ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
ढ़मढ़म कर देखावटी,दियना बाती बार।
अंतस में चारो डहर,घपटे घन अंधियार।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
मनखे ला पतियाय बर, कागज बनत अधार ।
कतका कमती देख तो, मनखे के अधिकार ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
पोथी पढ़ सीखे नहीं, पढ़ पढ़ कंठ सुखाय।
जाने में दू पग चलै, सीरजम उही कहाय।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
आगी बारे ना सकय,पानी नहीं भिंजोय।
अंतस आरुग ही रहय,हवा न सकय सुखोय ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
घट घट में भगवान हे,सून्ना ना घट एक।
उबरे हो जे गरब ले, सउँहत पावय देख ।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★
गुरुबर के पटकार में,दुख लागे ना रीस।
आँखी हर बेंझा जथे, देख रंग छत्तीस।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★
जगरमता आँखी खड़े,देखत रुप हजार।
भीतर के आँखी खुले,उसले ऊपर बजार।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★
मन हंसा हर हाट में,उसर पुसर छुछुवाय।
चीज नसनहा जोर के ,मन नइ सकय मड़ाय।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
तपसी बन के तन तपँव,संग वही धन जाय।
भौतिक जग के जोरना, सून्न जोड़ सब ताय।।
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
सुमता में सब सुख बसे,दुरमत में दुख जान।
धर सियान के बात ला,तज दे गा अभिमान।।◆
★★★★★★★★★★★★★★★★★★
होली की शुभकामना ,आप सभी को मीत ।
जीवन मे हर पल मिले,सदा सभ़ी से प्रीत।।
सदा सभी से प्रीत ,मिले आशीष दुआयें ।
हृदय सभ़ी का जीत ,खुशी से पर्व मनाये ।
बढे़ कीर्ति यश मान ,सजे जीवन रंगोली ।
मोहन शोभा बोल ,सुमंगलमय हो होली
हाँसी ले बढ़के नहीं,मनखे के सिंगार ।
आरुग झरना कस झरै,नस नस टरे बिकार ।।
***********************************
मनखे होती देख तो ,कागद में चिपटाय ।
बिन पतरा परमान के,कोन भला पतियाय ।।
************************************
उरथी कर ले फेर तँय, सिद्ध करे बर आस ।
देउत ठाढ़े डेहरी, मुँहरन करे उजास ।।◆
**********************************
साँस साँस सुमिरन करौं,प्रभु झन बिसरे चेत।
बिधुन मगन अंतस रहे , राम नाम ला लेत।।
************************************
नारी के उपकार ले,उरिन नहीं जग होय।
लाख सहे दुख ताप ला,जग सुख बीजा बोंय।।◆
**************************************
धन्य सुफल जिनगी करे , चलौं राम के गाँव ।
सुख बरसे चारो डहर,जेती धरले पाँव ।।◆
*************************************
हाँसत या रोवत पहा, रेंगत सुख दुख जोड़ ।
बेर चले आठो पहर, भँउरी ओकर गोड़ ।।◆
************************************
पंख लगा सुख दिन उड़य, दुख रतियाय पदोय।
सुख चाहै ते दुख परै, कतको गुनिया होय।।◆
************************************
उही जगत में धन्य हे, जेन भजै हरि नाम ।
राम भजन तारन तरन,तन के नहीं कुछु दाम।।◆
*************************************
रेंगत या बइठे पहा, जिनगी आखिर तोर ।
फेर नहीं मनखे कभू ,मरकी पर मूड़ फोर ।।◆
*************************************
माटी में मिलथे जमो, माटी उपजे जात ।
मूडी हाँडी बाँट के, फेर न कर सौ बात ।।1।।
*************************************
माटी हाँडी फूट के, मनखे ला समझाय ।
रे सरेख अपने सहीं, नहीं ठेंसरा सहाय ।।2।।
************************************
रहे खखाये इन्द्री ह , कतको दोंदर बोज ।
रीता के रीता मिलै, कतको भरले रोज ।।4।।
*********************************
मेला ठेला का बुलौ, बिरथा सब लगवार ।
भीतर कोती सार हे, लहुटौं अंतस खार ।।
***********************************
पाँच तत्व रचे पुतरी, झन ले ककरो हाय।
हाय धरे ले मर जबे, समझ न पाबे बाय ।।
************************************
रचत उझारत राम हे, ऊँकर हाथ सब बात।
पानी उपके फोटका, कस मनखे के जात ।।
**************************************
धन्य धन्य जिनगी लगे , रहौं राम रुख छाँव ।
सुख बरसत चारो डहर,जेती धरथौं पाँव ।।
*************************************
ये तन अनगिन टोंड़की, करसा कस करतार ।
उना कभू होही नहीं, नाम समुन्दर डार ।।
***********************************
घट घट में भगवान हे,मन आँखी ले देख।
गरब भाव ला छोड़ दे, सब ला बने सरेख।
खोजव झन संसार में,हिरदे प्रभु के वास।
बुद्धि डहर दुरिहा परे,भक्ति डहर ले पास।।
हाँसी ठट्ठा दिल्लगी ,जिनगी के व्यवहार।
आरुग झरना कस झरे,नसनस टरय बिकार ।।
कागद के कुटका करय, मनखे के पहिचान।
जे जतका कागद धरे , ते ततका गुनवान ।।
भजन भाव मा मन लगा,तब टरही दुख दोख।
ठगिया माया पेड़ के,ठाठा परही कोख ।।
माया मा अरझे रहय,वो हर भंँवरी खाय ।
प्रभु नाम सुमिरन करय,वो भव ले तर जाय।।
दोहा अंताक्षरी
जस नदियाँ भाँवर भुलय,समा समुन्द गहीर ।
तस मनखे के बुद्धि हर,होय भजन ले थीर।।
धरे धरे सत के ध्वजा, जे मनखे मर जाय।
देस राज इतिहास में,नाम अमर कर जाय।।
ये जग महा बिचित्र में,बहुरुपिया बन लोग।
लात मार पर पेट में,जेंथें छप्पन भोग।।
लाल रंग लूगा फभे ,अँचरा लहरबटोर। चूरी सेन्दुर लाल अउ,टिकली बरत अँजोर।।
वाह मस्त दोहा हवय,फेर फँसा झन मार।। दूसर कोनो शब्द ला, देके कर उपकार।।
लकठा में रहिते कहूँ,तब हो जातिस भेंट ।। मन हर खोजत थक जथे, सुरता भरथे पेट ।।
रखहूँ अँचरा छोर में,मया दया ला बाँध।। आहूँ रद्दा देखबे, रोटी पीठा राँध।।
ये भुँइया भगवान के,सब जग ओकर खार। मालिक नोहस जान ले ,तँय अस चौंकीदार।।
[ये मनखे परदेस में,बइठे खम्बा गाड़।। मोर तोर माला जपत, काई रचगे हाड़।।
नहीं चलँव कतको कहँव,बेरा हर रेंगाय।
माड़ी फूटत ले उही,कोपर कस घिरलाय।।
रटहा डारा बइठ के, बेंदरवा इतरात। अधर परे हे जीव हा,मेछरावत बइहात।।
जतका गल्ती मैं करँव,करे न ओतका कोय। कतको डउल लगात हँव,तब्भो गड़बड़ होय।।
आँच न आवन दन कभू,हमर छंद परिवार।
कक्षा में करबो सबो,गल्ती अपन सुधार।।
रो ले सुसी बुतात ले, कोनो संग नइ रोय। भरम टूट जाही बने,जी हरहिन्छा होय।।
महल अटारी में रहे,सब दिन जेन अघाय।। ओ हर देखव भूख ला,अरथाये बर आय।।
मरके कोनो कब कहाँ, पाये प्रभु के धाम।। साँस सासँ सुमिरन करय,ओकर बनथे काम
नान नान लइका तको,नशा करत हें आज। सबके मूड बिराजगे, हे कलजुग महराज।।
डहर चलत डर्रात हे,अब तो बेटी जात। रक्सा लहुटे आजकल,मनखे नही चिन्हात।।
खसलत उम्मर तोर तो,रे मनवा अब चेत।। बाराभूत न चाल चल,उबरन रद्दा नेत।।
महर महर गमकत हवय,बेनी खोंचे फूल।। कोनो दिन मोरो गली,अँगना आके बूल।।
मया दया धरमी रखे,सब बर एक समान।
सबके मुहरन में दिखे,ओला बस भगवान ।।
जस ड़ोगर उपर घलो, रुख राई हरियाय।।
ठउका जम्मो बात ला,सतगुरु हर जनवाय। तेकर सेती जगत में,सबले बड़े कहाय।।
जइसे बाघ पिलोर ला, करे शिकार सिखाय।
तस गुरुजन मन हर हमर,छंद मरम जनवाय
तरी डहर पानी चले,आगी ऊपर जाय।
पवन चलय चारो डहर, तइसे मन हा धाय।।
जाय नहीं मनखे कभू,सत के रद्दा छोड़।। अउ सत ला जाने चिन्हे,धर लय गुरु के गोड़।।
घात लगाके बाघ हर,जइसे करय शिकार।। लक्ष्य तहूँ हर नेत के,डउल लगा करतार।।
सब रहिथे अंजान बन,उहाँ मया रस घोर। मनुख होय के भाव ला,कर दे सुघर अँजोर।।
सार बात धरबे बने,रे मन बिरथा टार। भसकोले बर बाट मे, मिलही मनुख हजार।।
पाहू सब सम्मान ला,करहीं सब गुनगान। गुन सीखे ले जगत मे, मनखे के बड़ मान।।
धीर धरे नारी सदा,कभू न होय अधीर। बजनी बाजे भूख संग, चलय कछोरा भीर।।
जाके हाट बजार ले, लाने जिनीस खरीद। फेर कभू माँगे नहीं, पक्का बिल रसीद।।
संसो सबो भगाय बर,करबे एक्के काम। सब कारज ला सँउपबे,जगतपति श्रीराम।।
अँटियाथस डोरी असन,कइसे मिलही चैन। बारा कोती मन फिरय,भटकत मिरगा नैन।।
माथ मउर मुकुट हे, करधन अउ बनमाल । लोकलोभावन रुप हे,जय जगपति नंदलाल ।।
रेंगय जे मूड़ी नवा,बाट जोजवा लोग। काटे बर बकरा असन,कोनो मरय न सोग।।
ये आँसू के धार में, बड़े बड़े गय बूड़। पार न पाइन खोज के, मतलब हावय गूढ़।।

No comments:

Post a Comment

संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...