Tuesday, 21 July 2020

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मैं शोभामोहन श्रीवास्तव चौपाई प्रतियोगिता की अपनी समस्त 103 चौपाईयाँ सादर समीक्षार्थ प्रस्तुत कर रही हूं ।
शुक्रवार
*शिक्षा/ रोजगार*
कलम की सुगंध छंदशाला चौपाई शतकवीर प्रतियोगिता -2019
दिनांक -11-01-2019
विषय गणपति वंदना /सरस्वती वंदना / शिक्षा /रोजगार
महाकाय गननायक राजा ।
सिद्ध करो गुणनिधि मम् काजा ।।
बिनती करौं चरन धरि तोरी ।
मेट अविद्या अवगुण मोरी ।।1।।
जय जय महा धवल धुति वाली ।
अंतस भुवन करो उजियाली ।।
जय वरदानी विराजित हंसा ।
ऋषि मुनी देवन करत प्रसंशा ।।2।।
जग विद्यालय भवन सरीखा ।
जगती दृश्य नित्य नव सीखा ।।
संयत जीवन जियन सीखावे ।
जो सीखे वह सब सुख पावे ।।3।।
सकल जगत है पर उपकारी ।
जड़ चेतन सब ही हितकारी।।
दृश्य जगत ईश्वर की प्यारी ।
सिखलाती है जिम्मेदारी ।।4।।
निजतन नियत धर्म पहचानी ।
सीखो और बनो तुम ज्ञानी ।।
पंचतत्व परहित सिखलाये ।
शिक्षा कण -कण देती जाये ।।5।।
यह संसार है एक सराया।
मत कर अपना और पराया ।।
आते जाते लोग सिखाते ।
छूटेंगे सब झूठे छूटेंगे ।।6।।
अंधकार की सभी गठानें ।
खुले कौन बिध मन में ठाने ।।
गुरुजन विज्ञ सुसंगतकारी ।
निश्चय होय गुण अधिकारी ।।7।।
उत्तम संगति बन अनुगामी ।
हो सब ही जगसुख के स्वामी ।।
जो मिटाय मन अंधक कारा ।
धन्य गुरु वह जगती न्यारा ।।8।।
विद्या बल जन जग सुख पावे ।
ज्ञान पाये जो उसे बढ़ावे ।।
शिक्षित पुरजन परिजन सारी ।
होय जगत सुखमय मनहारी ।।9।।
ज्ञान सदा सम पावन गंगा।
बढै सदा सेवन सतसंगा ।।
ज्ञानयज्ञ दुख संशयहारी ।
विद्या सदा सुमंगलकारी ।। 10।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छत्तीसगढ़
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शनिवार
*नदी/जल*
कलम की सुगंध छंदशाला चौपाई शतकवीर प्रतियोगिता -2019
दिनांक -12-01-2019
घर से निकली बनी बावरी ।
पिया मिलन कर लेन भांवरी ।।
बदहवास पुर नगर- नगर में ।
फिरत लुटावत नेह डगर में ।।1।।
अल्हड जैसी चाल मचलती ।
अमृत को छलकाते चलती ।।
कहीं सहमती कहीं सिकुड़ती ।
मगर कभी पीछे ना मुडती ।।२।।
सूखे बाग -बगीचे सींचे ।
पी के पथ चल आंखें मींचे ।।
मानव पशु खग वृंदन तोसे ।
खेती सिंचन कर जग पोंसे ।।3।।
चट्टानों ने राहें रोकी ।
अपनी सारी ताकत झोंकी ।।
पर उद्दाम तरंगों वाली ।
पिया सुमिर बढती मतवाली ।।4।।
तूफानों से कर बरजोरी।
मन में सिंधु बसाकर गोरी ।।
सबकी प्यास बुझाती जाये ।
मन में अपने प्यास छुपाये ।।5।।
अनजाना है बाट पिया का ।
बहुत बुरा है हाल जिया का ।।
मान घटा पर्वत से आई ।
भई विवश प्रीत तरुणाई ।।6।।
नागिन के जैसी बलखाती ।
मिलन गीत मन लगन लगाती ।
परिजन प्रियजन टहल बिगारी ।
पिय परिवार समझ जग सारी ।।7।।
उजड़े नगर बसाती जाये ।
सब का मन सरसाती जाये ।।
अल्हडपन में नाचे घाटी ।
बाट घाट के काटे माटी ।।8।।
धार धुँआ करती बन झरना ।
हो जाये जग तारण तरना ।।
राग भरे जीवन हरसाऐ ।
अंतर में उल्लास जगाऐ ।।9।।
द्वार आय अतिथिन सत्कारे ।
अभिनंदन करि पांव पखारे ।।
गाँव देहरी दिया नदी है ।
लेकिन यह बेहोश सदी है ।।10।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
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रविवार
*वृक्ष/ वन*
कलम की सुगंध छंदशाला चौपाई शतकवीर प्रतियोगिता -2019
दिनांक -13-01-2019
वनवासी जन का संचित धन ।
जीव वृंद का मृदु अनुबंधन ।।
पेड़ सभी जीवो का सहचर ।
और पक्षियों का गृह कोटर ।।1।।
पेड़ सदा होता उपकारी ।
पेड़ सजाता जग फुलवारी ।।
पेड़ से सबकी नातेदारी ।
पेड़ पे जाऊँ वारी वारी ।।2।।
पेड़ो में भी संवेदन है ।
पेड़ो में भी अपनापन है ।।
पेड़ो भी हँसता औ रोता है ।
पेंड़ो में जीवन होता है ।।3।।
जब जब पेंड़ से टूटे डाली ।
मुरझाती उसकी हरियाली ।।
पेड़ पड़ोसी पेड है साथी ।
पेड़ ही जीवन दीपक बाती ।।4।।
पेड़ औषधि पेड हलाहल ।
पेड़ ही जेवर गहना भूतल ।।
पेड़ो से सुरभित है जीवन ।
पेड़ो से झड़ता अपनापन ।।5।।
पेड़ो में गहरा नाता है ।
पेड़ पेड़ संग बतियाता है ।।
पेड़ पेड़ से जब मिलते है ।
गलबहियां करते हिलते हैं ।।6 ।।
मैं पेड़ो से बतियाती हूँ ।
सवसे सगा उसे पाती हूँ ।।
पीपल छायादार घना है ।
पात पुष्प फल गांव बना हैं ।।7।।
पेड़ झूमते हैं उमंग में ।
डाली फूल पराग संग में ।।
सब पेड़ो की जात अलग है ।
धरती माता सबकी सग है ।।8 ।।
पेड़ संपदा है जीवन हैं ।
पर उपकार पेड़ का प्रण है ।।
पेड़ो में सब रस औ आसव ।
पेड़ो से जीवन में उत्सव ।।9
पेड़ो से पंछी का कलरव ।
पेड़ो से जीवन का वैभव ।।
लोगो करो पेड़ का आदर ।
एक एक पेड़ लगाओ सादर ।।10।।
झूमें कभी बसंत बहारा ।
फूल खिले महके संसारा ।।
रसवंती फलदार पेड़ हैं ।
प्रकृति का आधार पेड़ है ।।11।।
पेड़ बिना फल फूल न होंगे ।
सर तडाग औ कूल न होंगे ।।
तड़प तड़प कर मरना होगा ।
हर्जाना तो भरना होगा ।।12।।
पेड़ लगाओ पेड़ लगाओ ।
माता का मत वसन घटाओ ।।
धरती माँ का मान बढ़ाओ ।
हरी चुनर धानी ओढ़ाओ ।।13।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
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सोमवार
*वायु/स्वच्छता*
कलम की सुगंध छंदशाला चौपाई शतकवीर प्रतियोगिता -2019
दिनांक -14-01-2019
सब लोकों में आये जाये ।
सकल चराचर पवन समाये ।।
सब जीवो का प्राण पवन है ।
सबहि सहचर और स्वजन है ।।1।।
पवन विचरता संत समाना ।
करता सब जग आना जाना ।।
पवन चराचर जग सुखकारी ।
पवन सदा ही पर उपकारी ।। 2।।
सन्नाटे में सरसर सरसर ।
पेड़ पात में झरझर झरझर ।।
रंगो के मौसम में रंग में ।
रहे प्राण सम अंग अंग में ।।3।।
पवन बोल सन्नाटा तोड़े ।
कभी टोहने सरपट दौड़े ।।
कभी धुंध बन आँखें घेरे ।
ताल सूर्य के चित्र उकेरे ।।4।।
पवन बिना ना बोलचाल हो ।
अहम नहीं निज पर विशाल हो ।।
पवन चलाये पवन हिलाये ।
पवन ही सारा कृत्य कराए ।।5।।
जगत चक्र चले पवन गति से ।
आज्ञा पाकर जगतीपति से ।।
अधर बिचरते ग्रह अरु तारा ।
पवन सभी का परम अधारा ।।6।।
सबको बांध नियम की डोरी ।
पवन हिलाय डुलाय बहोरी ।
पवन बली झपकावहिं आँखी ।
पवन बिना कहाँ कोउ साखी ।।7।।
पवन खिलाये पवन पिलाये ।
पवन भूख व पियास जगाये ।।
पवन चले मन इच्छा जागे ।
पवन चले इंद्रिय सुख भागे ।।8।।
पवन चले सुख व दुख जनाये ।
पवन चले एक जोग कहाये ।।
पवन चले चित चिंतन आवे।
पवन चले एक रोग बढ़ावे ।।9।।
पवन बली बहवाय नदी को ।
पवन बली पलटाय सदी को ।।
आदि पवन अरु अंत पवन है ।
कोटिक पावन पवन नमन है ।। 10।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छत्तीसगढ़
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मंगलवार
*धरती /आकाश*
कलम की सुगंध छंदशाला चौपाई शतकवीर प्रतियोगिता -2019
दिनांक -15-01-2019
जग जय जग की पालनहारी ।
जय जय जय धरती महतारी ।।
जलथल झील समुंदर धारी ।
नदियों की करधनी तिहारी ।।1।।
सूर्य संग करती पगफेरा ।
करती सुखमय जगती डेरा ।।
रंगबिरंगी चटख बहारें ।
प्रकृति है परिधान तिहारे ।।2।।
सूरज जाये तुम पर वारी ।
सदा सुहागिन पिया पियारी ।।
मेघाजल तुम पर बरसाता ।
तुमको देख देख इतराता ।।3।।
माँ बनकर जीवन की दाती ।
सब पर अपना प्यार लुटाती ।।
केवल तुम जैसी उपकारी ।
इस जग में होती महतारी ।।4।।
जैसे माता दूध पिलाती ।
निज छाती तुम अन्न उगाती ।।
जीवन को करि जतन बढाती ।
ब्रह्मलीन निज अंक सुलाती ।।5 ।।
धरती सब माता की माता ।
धरती सब दानी की दाता ।।
गंग जमुन पीयूष बहाती ।
जीवन में उत्सव बरसाती ।।6।।
कोख रतन भंडार हैं तेरे ।
नमन तुम्हे माँ सांझ सवेरे ।।
फैले तेरे बाग बगीचे ।
रख जिनको निज आँचल सींचे ।।7।।
जाति धर्म पर लड़ने वाले ।
सब बच्चे हैं तेरे पाले ।।
तू ही है हम सबकी माता ।
सबसे तेरा निर्मल नाता ।।8 ।।
तुमको कोई बाँट न पाया ।
खाली हाथ गया जो आया ।।
कागज पर अधिकार जताया ।
तेरी महिमा समझ न पाया ।।9।।
तू है सब जीवों की दाती ।
सब पर अपना प्यार लुटाती ।
कंटक में भी फूल खिलाती ।
जीवन को जीना सिखलाती ।।10 ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
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बुधवार
*माता/पिता *
कलम की सुगंध छंदशाला चौपाई शतकवीर प्रतियोगिता -2019
दिनांक -16-01-2019
माता से न बड़ा उपकारी ।
हम सबकी वो प्राण अधारी ।।
पिता गगन तो मातु धरा है ।
ममता युक्त भरा अचरा है ।।1।।
मां की है हर बात निराली ।
माता नित करती रखवाली ।।
खुद भूखी रह हमें खिलाती ।
सूखे मे वह हमें सुलाती ।।2।।
हमे पालती दुख को सहकर ।
रखती घर को सोच समझकर ।।
रक्षा करती सदा हमारी ।
मां होती है सबसे न्यारी ।।3।।
पिता संग वह हाथ बटाती ।
साथ साथ मिल काम कराती ।।
कभी पिता का साथ छूटता ।
मां का दिल सब ओर टूटता ।।4।।
हम सबका वह पेट पालती ।
अपने सुख को और टालती ।।
ममता की सागर है मइया ।
जैसे होती कोई गइया ।।5।।
प्रथम गुरू मां ही होती है ।
प्यार सुबीज सदा बोती है ।।
मां दुर्गा है मां है काली ।
मां से होती है खुशहाली ।।6।।
गंगा जैसी निर्मल मां है ।
हिम के जैसी शीतल मां है ।।
मां के दिल को नहीं दुखाना ।
ना ही उसको कभी रुलाना ।।7।।
मातु पिता ईश्वर सम जानो ।
रार नहीं उनसे तुम ठानो ।।
कभी सुखी वह रह ना पाते ।
जो माता को दुख पहुचाते ।।8।।
बच्चे कितने ही बढ़ जायें ।
और पहाड़ों पे चढ़ जायें ।।
पर मां से वो सदा ही निचे ।
मां रहती हर पल ही पीछे ।।9।।
मां की महिमा सकूं न गाई ।
मां पहाड़ तो हम हैं राई ।।
जय जय जय हमरी तुम मइया ।
राखो हमको तुम निज छइयां ।।10।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर , छ.ग.
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गुरुवार
*श्रृंगार/ वसंत*
कलम की सुगंध छंदशाला चौपाई शतकवीर प्रतियोगिता -2019
दिनांक -17-01-2019
भौंरा पागल हौले हौले ।
आकर पास कली के बोले ।।
बहके बहके हैं ऋतुराजा ।
सब बहके हैं तूं भी आजा ।। 1।।
पहले थोड़ा कली लजाई ।
फिर हल्के से ली अंगड़ाई ।।
दिन बसंत का प्यारा आया ।
मौसम में है मस्ती छाया ।।2।।
आजा खेले आंख मिचौली ।
बोलें मीठी प्यारी बोली ।।
बागीचा बोराये झूमें ।
तितली कहीं तुझे ना चूमे ।।3।।
रंग बसंती साँस समाये ।
सुमन वाटिका पुलक लुटाये ।।
ताल लिपट परछाई सोई ।
बिरहन रो रो आंख भिगोई ।।4।।
बासंती दुलहिन सिर ढ़ाके ।
देखे पिया नयन कर बाँके ।
महुआ झूम रहे मदमाते ।
बहके भौरे गीत सुनाते ।।5।।
फूलों से लद गई है डाली ।
रूत कैसी देखो सुख वाली ।।
पाकर पिय कोयल मतवारी ।
कुहुक कुहुक करती मनुहारी ।।6।।
बिछे पलाश पिया के पथ में ।
बासंती मौसम के रथ में ।।
पीली चुनरी सरसों डाले ।।
पगलाये है सब मतवाले ।।7।।
प्यारी मीठी झिड़की भाये ।
देखो मगन मदन बोराये ।।
फूल बाण चहुओर चलाये ।
सबके हिय भूचाल मचाये ।।8।।
ओस पड़े सुंदर पातों में ।
मोती टाँके जज्बातों में ।।
मौसम ओढ़े गंध चदरिया ।
रंग बिरंगी धरा बदरिया ।।9।।
मधुबनी भंवरों का डेरा ।
बचना संभव अब ना तेरा ।।
तेरे धड़कन की शहनाई ।
मिलनोत्सव को है बौराई ।।10।।
मन में तेरे प्यार भरा है ।
बे मतलब सारा नखरा है ।।
मैं मकरंद का दीवाना हूं ।
तेरा जाना पहचाना हूँ ।।11।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
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शुक्रवार
*मित्र/मित्रता*
कलम की सुगंध छंदशाला चौपाई शतकवीर प्रतियोगिता -2019
18-01-2019
सभी अमंगल दूर भगाते ।
जीवन में सुख नेह लुटाते ।।
जानो मित्र वही हैं सांचा ।
विकट दशाओं में जो जाँचा ।।1।।
संग सदा सुमित्र सुखकारी ।
विपत घड़ी वह होय दुखारी ।।
मित्र सदा शुभ मंगलकारी ।
हरता अंतस चिंता भारी ।।2।।
बेमतलब का प्यार जताए ।
दुख में आए बिना बुलाए ।।
सुख में सदा रहे हरसाये ।
सदा मित्र मंगल मन भाये ।।3।।
सोच समझकर मित्र बनाना ।
बिन समझे मत धोखा खाना ।।
मन घेरे के गीत सुनाते ।
औ भूलो तो याद दिलाते ।।4।।
वो ही सच्चे दौलत धन है ।
मित्रों से मधुमय जीवन है ।।
अड़चन की दीवारें तोड़े ।
मित्र सेतु बन के सुख जोड़े ।।5।।
जाने मन की सारी बातें ।
सहलाएँ कुचली जज्बातें ।।
बिना कहे मन की गति जाने ।
यदि रूठो तो लगे मनाने ।।6।।
यदि रोवो तो मीत हँसाये ।
करके सौ सौ जतन मनाये ।।
धन्य मित्र से होता जीवन ।
जीवन बन जाता है मधुबन ।।7।।
बड़े खून से मन के नाते ।
जो सुख-दुख में साथ निभाते ।।
ज्यो गूंगे ने हो गुड़ खाया ।
और फिर स्वाद बता ना पाया ।।8।।
मित्र मित्रता अकथ कहानी ।
सहसो मुख नहि जाय बखानी ।।
अहंकार जो रखे किनारे ।
वो ही होते मित्र पियारे ।।9।।
लेनदेन सौदा नहि जाने ।
बस उनका हो अपना माने ।।
बिना बताए मन पढ़ लेवे ।
चुप्पी का मतलब गढ़ लेवे ।।10।।
करते जब तब सुखवर्धन हैं ।।
वे ही मेरे संचित धन हैं ।
सब मित्रों को कोटि नमन है ।
अर्पित मेरे भाव सुमन है ।।11।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छत्तीसगढ़
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शनिवार
*त्यौहार *
कलम की सुगंध छंदशाला चौपाई शतकवीर प्रतियोगिता -2019
दिनांक -19-01-2019
त्यौहार या उत्सव "
त्योहारों का देश हमारा ।
भारत सारे जग से न्यारा ।।
प्रतिदिन का त्योहार निराला ।
उर अंतर में भरे उजाला ।।1।।
जीवन में लाएं खुशहाली ।
आल्हादित मन करने वाली ।।
उत्सव जीवन का वसंत है ।
हम उत्सव से प्राणवंत हैं ।।2।।
मन मे प्रेम बढ़ाये गहरे ।
उत्सव बन खुशियों की लहरें ।।
उत्सव है जीवन की शैली ।
उत्सव बचपन की अठखेली ।।3।।
रिश्तो को मजबूत बनाते ।
हर्ष और उल्लास लुटाते ।।
तरू शाखा पल्लव उत्सव हैं
खग दल का कलरव उत्सव हैं ।।4।।
खानपान सुख वैभवशाली ।
रीति रिवाज अजीब निराली ।।
सब उत्सव से जीवन पाते ।
नव पीढ़ी हस्तगत कराते ।।5।।
उत्सव संस्कृति का रखवाला ।
और विरासत मोती माला ।।
उत्सव भारत का दर्शन है ।
उत्सव जीवन आकर्षण हैं ।।6।।
उत्सव जीवन का वैभव है ।
उत्सव के सहस्त्र अवयव है ।।
उत्सव जीवन की सज्जा है ।
उत्सव संस्कृति की मज्जा है ।।7।।
उत्सव जीवन का अलाप है ।
हरता यह सब शोक ताप है ।।
उत्सव जीवन की मिठास है ।
उत्सव का भारत निवास है ।।8।।
उत्सव हाट बजार सजाते ।
उत्सव ढोल मृदंग बजाते ।।
उत्सव बल आनंद हिलोरें ।
दृढ़ करती रेशम सी डोरें ।।9।।
उत्सव जीवन का अधारा ।
मानव का है बहुत दुलारा ।।
उत्सव है यह मृण्मय जीवन ।
उत्सव है जीवन का क्षण क्षण ।।10।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छत्तीसगढ़
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रविवार
*देशप्रेम *
कलम की सुगंध छंदशाला चौपाई शतकवीर प्रतियोगिता -2019
दिनांक -20-01-2019
विषय -देश प्रेम
जय जय जय हे भारत माता
कण कण तेरा वैभव गाता ।।
निशदिन तुमको माथ नवायें ।
यश महिमा गुण कीर्तन गायें ।।1।।
रामकृष्ण तू ही उपजाती ।
मानवता को राह दिखाती ।।
कोटि कंठ करते हैं वंदन ।
स्वीकारो मेरा अभिनंदन ।।2।।
जीवन भर तेरे गुण गायें ।
अंत समय में गोद समायें । ।।
श्याम जमुन जल उजली गंगा ।।
तन पर खेले जलधि तरंगा ।।3।।
शब्द पुष्प चुन मातु चढ़ायें ।
पगवंदन कर चरण दबायें ।।
चट्टानों से टकरा जायें ।
माँ तेरा जयगान सुनायें ।।4।।
माँ तुमने जो लाल जने है ।
वह दुश्मन के काल बने है
कफन बांध सिर पर जब जाते ।
दुश्मन के हैं होश उड़ाते ।।5।।
तेरे लिए ही जीते मरते ।
न्योछावर निज जीवन करते ।।
करते मातृभूमि जयकारा ।
दुखद पंथ दुख हो छुटकारा ।।6।।
सरहद पर जो लड़ने जाते ।
मातृभूमि पथ में मिट जाते ।।
ऐसे वीरों को वंदन है ।
देशभक्ति जिनका जीवन है ।।7 ।।
सरहद खड़े खून से खेले ।
सीने में सौ गोली झेले ।।
दर्जन भर से लड़े अकेले ।
अरि के प्राण पखेरू ले ले ।।8।।
सीमाओं के जो रखवाले।
उनसे बड़े न जीने वाले ।।
मृत्यु देख कर भय ना खाते ।
साँसो को निज दाँव लगाते ।।9।।
मौत जिंदगी जब ठन जाये ।
डंटे रहें मन बिना डिगाये ।।
शान तिरंगा रखे बचाये ।
वापस भले लौट ना आये ।।10।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
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संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...