बाग बगइचा लठरत झुमरत,
झरे पान अइलाये हे ।
पेड़ बसंती नवा देंह बर,
जुन्ना नता भुलाये हे।
पिंयर पिंयर सब पाना गिरगे,
चुप्पे धनहा डोली हे ।
घाम घरी सुस्तइया के मुँह,
दू टप्पा नइ बोली हे ।।
मेड़-पार सब हवँय कलेचुप,
देख गति ला पाना के ।
कोनो नइ हे संगी जग में,
होये ताना-नाना के ।।
शोभामोहन
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