रंग भंग न डारहू गीतिका
2122 2122 , 2122 212
आज पुन जागे हवय अउ,साध मन चुप होत हे
सब अड़ानीपन भुलागे,देह अब बिटोत हे।
देख हे निच्चट कलेचुप, रंग भंग न डारहू
चित्त के तरिया म कोनो,कंकरी झन मारहू ।।
हाय उठही तेन लहरा,पार खोजे भागही
तन धँवाही प्रान ला तब, चेत ओती जागही।
हे हथौंड़ा परत कहिके,सोग तो न बघारहू
चित्त के तरिया म कोनो,कंकरी झन मारहू ।।
चेत के डबरा म गंगा,जल पझारे साध हे
ये कुलुप अँधियार अंतस,दीप बारे साध हे।
ठान ठाने हँव जबर मँय, हाँक तुम झन पारहू
चित्त के तरिया म कोनो,कंकरी झन मारहू ।।
शोभामोहन
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