१)
सुरता मन के कुंजगली मा , रेंगत कहाँ थकासी लगथे ।
खाये खेले हाँसी ठट्ठा , गुनके फोकट हाँसी लगथे ।।
(२)
पाँव पखावज धुन के सुरता, गुन गुन बिकट मतासी लगथे ।
मन भितिया मा अटके-चटके, ननपन मीठ बतासी लगथे ।।
(३)
बिगन छुए तो मन नइ मानै, बाँधे तन रोआसी लगथे ।
विगन देह मन दँउड़त जाथे, गुन गुन के पछतासी लगथे ।।
(४)
परस करत सग नत्ता जम्मो, अब देखे मा साँसी लगथे ।।
बीते सुख के पाछू सुरता, मिलत बरग ना रासी लगथे ।।
शोभामोहन
२२/०५/२०२०
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