धोये पोंछे असन बिहिनिया
मसहा रतिहा टारै रे।
सुरुज रेफ के बदन छुए ले,
अँधियारी हर हारै रे।।
डारा पाना सब इतरावै,
पुरवा घलो जोहारै रे ।
बाग-बगीचा मन ममहा के,
भौरा न्योता पारै रे ।
साँझ किरन बठचल्ला बनके,
नभ ला सुघर सँवारै रे ।
अपने बँइहा अपने छँइहा,
जीये बाट चतवारै रे ।।
बन काँदी के आड़ सजन हा,
ला चढ़ाव सिंगारै रे ।
गिरत ओस के मोती झर-झर,
भुँइया चरन पखारै रे ।।
जब अँजोर के मकुट पहिर के,
भुँइया मिलन बिचारै रे ।
माँग भरे चरचर ले सेंदूर,
गोठ मया रंग डारै रे ।।
शोभामोहन
१४/०१/२०२०
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