दुख नंँगत सपड़ाय (रूपमाला )
(१)
दुख बगर के सुख डहर के, बाट ला भुलुवाय।
कोन कोती जाय बर मन, कोन कोती जाय ।।
भोरहा का होत हावय, कुछु समझ नइ आय।
सुख रपोटे रेंगके सब, दुख नँगत सपड़ाय।
(२)
कोन दुख ला नेवते हे, कोन हे परघाय ।
बिन बलाये बिन चलाये, ते अपन हो आय ।।
चीज बस मा रूप रस मा, कोन हे सुख पाय ।
सुख रपोटे रेंगके सब, दुख नँगत सपड़ाय।।
(३)
नाम जस के लोभ फँसके, कोन हे सुख पाय।
सुख सुभीता ला सिधो के, मन भले बहलाय।।
लाग नत्ता राज सत्ता, पद बइठ बइहाय।।
सुख रपोटे रेंगके सब, दुख नँगत सपड़ाय।।
(४)
सोत सुख के बिगन जाने, सब डहर छुछुवाय।
प्रभु लहर के सुख डहर के,बात सुन नइ पाय बात।।
रंग मन ला रंग तन ला, बड़ गरब पनकाय।
सुख सधाये रेंगके सब, दुख नँगत सपड़ाय।।
शोभामोहन
खुश्बूविहार कालोनी
No comments:
Post a Comment