सबके पेट चलात किसान ।
अन्नदान दे राखत प्रान ।।
दाना नइ घर सेर पसेर।
अउ कतको ला करत कुबेर ।।
बड़े बिहिनिया जावत खेत ।
बूता काम ल ठउका नेत ।।
अन उपजाये जाँगर पेर ।
करत नहीं हे चिटको ढ़ेर ।।
भुँइया मा हे दू भगवान ।
इक जवान दूसर किसान।।
कुछु सुख नइ हे उनकर मेर।
बाहिर सब सुख सुविधा घेर।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०५/०५/२०२०
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