Tuesday, 21 July 2020

सुरता आइस बिपत म गाँव
(जयकारी छंद)
घर ला तजे गये परदेश ।
होय शहरिया बदले भेस।।
महतारी कतकोन बलाय।
फेर न उसरै तोला आय ।।
हमला तो तैं कहस गँवार ।
बनगे रहै गजब हुसियार ।।
पइसा कउड़ी चीज सकेल।
शान बघारस सहस न झेल।।
देख गँवइहा ला बगियास ।
अड़हा कहस अबड़ खिसियास।।
रंगे शहर डहर के रंग ।
सोझ न बोलस ककरो संग।।
आज बहुर के कइसे आय।
बिन परघाय बिन नेवताय ।।
का जीते बर हारे दाँव।
रद्दा भूले हावस गाँव ।।
गाँव मरन नइ देवै भूख।
आये होबे ओही धूक ।।
रोजगार बर छोड़े गाँव ।
सुरता आइस बिपत म छाँव।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०३/०५/२०२०

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