अनहोनी घटै घर-घर गाँव गाँव रे
अरे सोनपाँखी मोर,
चिरइ घर अँजोर,
अँचरा के छइहाँ में
रखके चलाँव रे।
चमकत आँखी तोर,
बुलथस गली खोर,
कलजुग देख जग
मन डर जाँव रे ।
मुँहरन चंदा कस
फूल के असन हस,
सुन सुन बयगुन
गुन कठवाँव रे ।
सबो बिसवास हर
जोरगत भरभर,
अनहोनी घटै घर-घर
गाँव-गाँव रे ।
छाती छोले अंधियार,
नानकुन दीया बार,
सरपिन रतिहा ले
झगरा उठाँव रे ।
पयजन बोलै झन,
छनछन-छनछन,
हरु-हरु डहर मा
गोड़ मडवाँव रे ।।
रकसा हा मनखे ते
मनखे हा रकसा ए,
समझ न आवै नोनी
कइसे समझाँव रे ।
कोनो हर फुनगी मा
दीया बारै बारन दे,
अँचरा लुकाँव डर
छाती चटकाँव रे ।
शोभामोहन
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