Tuesday, 21 July 2020

अरे मोर सोनपाँखी चिरई घर अँजोर

अनहोनी घटै घर-घर गाँव गाँव रे

अरे सोनपाँखी मोर, 
चिरइ घर अँजोर,
अँचरा के छइहाँ में 
रखके चलाँव रे।
चमकत आँखी तोर, 
बुलथस गली खोर,
कलजुग देख जग 
मन डर जाँव रे ।
मुँहरन चंदा कस 
फूल के असन हस,
सुन सुन बयगुन
गुन कठवाँव रे ।
सबो बिसवास हर 
जोरगत भरभर,
अनहोनी घटै घर-घर 
गाँव-गाँव रे ।

छाती छोले अंधियार, 
नानकुन दीया बार,
सरपिन रतिहा ले 
झगरा उठाँव रे ।
पयजन बोलै झन, 
छनछन-छनछन,
हरु-हरु डहर मा 
गोड़ मडवाँव रे ।।
रकसा हा मनखे ते 
मनखे हा रकसा ए,
समझ न आवै नोनी 
कइसे समझाँव रे ।
कोनो हर फुनगी मा 
दीया बारै बारन दे,
अँचरा लुकाँव डर 
छाती चटकाँव रे ।

शोभामोहन 

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