शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
Saturday, 23 May 2026
वेद सुमरनी जोहार २
सुखदेवैया वो ईश्वर, दिव्य गुन जोड़कर, जग सेती आगी सिपचैया ला जोहार हे /
शिल्प के सोधैया नर, धरमप्रान गुनधर,आगी जान शिल्प उपकैया ला जोहार हे /
चराचर जगधार, सरबज्ञ सरकार, अबिनासी सब सिरजैया ला जोहार हे /
अनंत सक संभार, सबलोक उजियार,आगी भाखा जिनिस बनैया ला जोहार हे /
टीका-सबसुख देवैया परमात्मा हर दिब्य गुन मन ले भरे अग्नि ला जगत हित बर उत्पन्न करे हे, वो अग्नि उत्पन्न करैया ईश्वर ला जोहार हे, शिल्पबिद्या के साधक शोधक मनखे जेन धरम परान अउ सर्वगुनसंपन्न हे, वो अग्निशोध करैया मन ला जोहार हे, जेन सबो चराचरजगत के अधार हे, अउ जेन सर्वज्ञ के सब लोक मन में सर्वकालिक अखंड सत्ता हे, वो सरकार मन के घलोक सरकार अजर-अमर अविनाशी जगत अउ जीव मन के आदिकर्ता सबके उपजैया परमशक्ति परमात्मा ला जोहार हे, जेन परमात्मा के शक्ति अनंत हे, अउ जेन सबलोक मन के एकमात्र प्रकाशक हे, अग्नि अउ भाषा उवा-उवा पदारथ मन के रचना करैया हे, वो असीम परमतत्व ला जोहार हेA
गुन भरे हे भौतिक, अगन धरके ठीक, गुनसाँट तमसहरैया ला जोहार हे /
सबो पदारथ गुन, सहित गुने जउन, दयालु अगन के सोधैया ला जोहार हे /
बिग्यानी दयालु भल, सबमीती भाव चल, एक ईश मोछ के देवैया ला जोहार हे /
सुख बाटे के सुभाव, जेकर बिन लगाव, अदूसर अइसे गोसैया ला जोहार हे /
टीका-भौतिक अगन जेन अबड़ मात्रा में गुन भरे हे, वो भौतिक अगन ला ठउका धरके वोमा गुन जोड़ के भिन्नजगत या भौतिक जगत के अंधियारहरैया विज्ञ पदारथ बिद्या के गुन शोध करैया मन ला जोहार हे] जेन परमात्मा परम दयालु अउ न्यायकरैया हे, अउ जेन सबो जीव मन के प्रति मितानी भाव रखथे, वो एकमात्र मोछ देवैया परमात्मा ला जोहार हे]लगाव-दुराव रहित जम्मो सुखदेवैया सुभाव युक्त वो परमात्मा ला जोहार हे, जेन अद्वितीय हे, जेकर जइसे तीनो बेरा में कोनो भी नइ अइसन सम्पूर्ण लोक-लोकान्तर के एकमात्र गोसैया सबो जगत के अधार परमात्मा ला जोहार हे /
जीवधर देह धारे, तस ईश जग सारे, रख जगवारी के करैया ला जोहार हे /
सब कोती देखे पाय, सम सबो रहे छाय, अमर अगोचर अथैया ला जोहार हे /
जीवदल सब काज, निहारत महाराज, एको छिन जीव नइ भुलैया ला जोहार हे /
तभे अधरम बर, जी नइ धँसे हमर, हाथ धर बाट रेंगवैया ला जोहार हे /
टीका-जइसे सबो जीवधर अपन-अपन काया ला धरथे, वइसे ही परमात्मा ये संसार ला धरथे, वो सब जीव रखवार परब्रह्म ला जोहार हे, जेन परमात्मा अतका विराट हे, कि एक संग सबो ठाँव देख सकथे, अउ सबो ठउर मन में समरूप समभाव ले व्याप्त रहत हुए अविनाशी अजर अउ अमर हे, अउ सर्वव्याप्त होय में भी सामान्य आँखी ले दिखे नइ जेन अथाह माने अतका सूक्ष्म अउ अतका बड़का हे, कि वोकर कोनो थाह नइ लगा पाय, वो परमात्मा ला जोहार हे, जेन सबो जीव मन के सबो करम ला पल-पल देखत हे, अउ कोनो भी प्रानी ला एक पल बर भी नइ भुलाय, अइसन परमात्मा ला जोहार हे, परमात्मा हमन ला हर पल देखत हे, अइसे जाने के कारन हमर चित्त कभू भी अधरम के अउ प्रवृत्त नइ होथे, अइसन सारथी बनके अपन अनुरागी जन मन ला हाथ धर के चलाय वाले वो परम परमात्मा ला जोहार हे A
सब जीव छिन छिन, लेखथे करम गिन, खत्ता चारो खूंट के देखैया ला जोहार हे /
अधरम तजे बर,जीव ला देखा डहर, सबो जान सुनके जनैया ला जोहार हे /
सब बर भाव साखी,राखे समभाव आँखी, समरथ सकल गोसैया ला जोहार हे /
जेला गावे गुनी जन, गावत शोभामोहन, परमेश सत्ता में रमैया ला जोहार हे /
टीका-जेन परमात्मा सबो जीव मन के सब करम ला हर पल देखत हे, अउ जीव मन के करम लेख ला सबो ठाँव निश्चित रूप ले अउ समभाव ले दृष्टिपात करथे, अइसन परब्रह्म परमात्मा ला जोहार हे] जेन परम सत्ताधीश परमात्मा के सत्ता में मन-करम-बचन ले रमथे, वो सबो ऋषि-मुनि महात्मा मन ला जोहार हे]जेन परमात्मा अधरम त्याग करवा कर अपन अनुरागी मन के बाट देखाथे,वोला जोहार हे]जेन सबो जीव मन के प्रति साक्षीभाव रखत हुए वोकर गुन मन अउ अवगुण मन के अवलोकन करथे, वो सकल सामर्थ्य युक्त परम परमात्मा ला जोहार हे, जेन परमात्मा के ऋषि-मुनि अउ महात्मा जन गुनान कर गुन गायन करथे, उही परम परमात्मा ला शोभामोहन गावत हे /
अविनाशी सूर्य रूप, निरदोस जगभूप, अन्तसपुर जीव बसैया ला जोहार हे /
सब जग रखवार, जीव राखे फूलभार, शुभ सतदेशना देवैया ला जोहार हे /
सवांगे सत्ता में रम, सुख पावत परम, अनंतभूषित निरखैया ला जोहार हे /
तेकरे होके उपासी, सिरजे आनंदरासी, सुखधाम आनंद बढ़ैया ला जोहार हे /
टीका-जेन परमात्मा तीनो बेरा में अविनाशी हे,जेन परम प्रकाश रूप सबदिन दोषरहित अउ सम्पूर्ण चराचरजगत के सबो लोक के एकमात्र गोसैया हे, जेन सबो जीव मन के अंत:पुर में नित्य-सरलग निवास करथे, वो परमात्मा ला जोहार हे] जेन सबो चराचर जगत के रखवार हे, जेन सबो जीव मन ला फूलभार माने बिगन भार अपन शरण में रखथे, जेन अपन आश्रित जन ला शुभ अउ सत्य के उपदेश देके मार्ग प्रशस्त करथे, वो परमब्रह्म ला जोहार हे] जेन परमात्मा अपन रचे सत्ता में परम सुख पाके नित्य प्रति रमण करत अनंत भूषित दृष्टिगोचर होथे, वो परमात्मा ला जोहार हे] जइसे परमात्मा अपन सत्ता में रमैया हे, वइसे ही अपन सत्ता में रमणकरैया ज्ञानीजन आनंद समूह ला पाथे, वो सबो सुखधाम अउ आनंद बढ़वार करैया महानुभाव मन ला जोहार हेA
बिगियान के बिहारी, होवे जेन नर-नारी, फल परमानंद पवैया ला जोहार हे /
उत्तम डउल करे, परमेश ले अभर, अंतस के खोली उजरैया ला जोहार हे /
दाई-ददा कस पोस, देखे सबो गुन दोस, शुभ तनसदनभरैया ला जोहार हे /
सिरजम करमन, करे जोग करे मन, तस शुभ करे जोजियैया ला जोहार हे /
टीका-विज्ञान मार्ग में बिहार करैया आविष्कार करैया नर-नारी जेन परमानंद ला पाथे वोला जोहार हे] जेन उत्तम उदिम करके परमात्मा सत्ता परमात्मा साक्षात्कार कर पाथे, अइसन अपन आत्मा ला प्रकाशित करैया ला जोहार हे, जेन परमात्मा दाई-ददा अउ गुरु के जइसे हमर गुन-अपगुण ला देखत हे, अउ अपगुण उबार करके कायारूपी घर में शुभता भरथे, वोला जोहार हे, जेन हमर चेतना ला उत्तम करम के प्रति प्रेरित कर शुभ करम बर बिनय करथे, अउ हमन ला सबदिन शुभ करम ला करे बर संस्कारित करथे, वोला जोहार हेA
मनखे वोलाजोहार, गोड धर होय पार, परमेश सत्ता के सधैया ला जोहार हे /
जग रच जीव बर, नदियां समुंदभर, जीव सुख सेती ओरियैया ला जोहार हे /
जस रबि झींक-झींक, भूगोल धरथे ठीक, तस सरबस के धरैया ला जोहार हे /
सबो जीवदल पाप, अउ पुन परताप, फल देये सबमें समैया ला जोहार हे /
टीका-हे मनखे उही के बेर बेर वंदना करौ जेन ये संसार में जनम-मरन के बंधन ले पार होय बर परमात्मा के सत्ता में सरलग रमनधर्मा हे, वो सबो महानुभाव ला जोहार हे] जेन परमात्मा हर सबो जीव मन के सुख में जिनगी पहाय के निमित ये आनीबानी के जिनिस ले परिपूरन सुंदर संसार के रचना करे हे, समुन्दर उवा-उवा जल ठाँव के रचना करके वोमा जल भरे हे, ताकि सबो जीव सुख में जिनगी पहाय कर सके, अइसन परम उदार अउ ओरीओर रचनाकरैया परमात्मा ला जोहार हे] जइसे सुरुज सबो भूगोलीय पिंड मन ला अपन आकर्षण बल ले धरथे, वइसे ही सबो पिंड मन अंतरिक्ष में स्थित नभ गंगा मन सहित सबो लोक मनके धरैया परमात्मा ला जोहार हे] जेन सबो जीवदल के सबो पाप अउ सबो पुन्य प्रताप के फल देवैया सबो ठाँव समभाव ले बिचरन करैया अउ सकल चराचर जगत के रमन करैया सबके भीतर समाय परमात्मा ला जोहार हे /
लख सहस सुरुज, जेमा उवे बुड़े पूज, वो जग अलगे रहैया ला जोहार हे /
जेमा जाके लोक बुड़े, जुगल अजुग जुड़े, एक उही जगत गोसैया ला जोहार हे /
द्वीप अउ अगास गंगा,सबो पिंडा संग-संगा, समाय अगम अउ अथैया ला जोहार हे /
साधू उपदेशे जेन, मोछगति पाय तेन,सबो गोतियारी के निभैया ला जोहार हे /
टीका-जेकर भीतर लाखो सहस्त्र सुरुज उदित होके अस्त हो जाथे, एकमात्र उही परमात्मा ये संसार में अलगे हे, वो संसार अलगे रहैया ला जोहार हे, जेमा जाके लोक-लोकान्तर उदित अउ अस्त होथे, जेमा जग्गा-अजुग्गा दुनो ही जाके समाय होय जाथे aकेवल उही संसार के भरण पोषण करैया ला जोहार हे]जेन परमात्मा के भीतर सबो द्वीप-द्वीपंतर अउ लोक-लोकान्तर अगासगंगा अउ अंतरिक्ष में स्थित सबो पिंड एक संग समा जाथे, इही कारन ले जेन परमात्मा अपार हे, वो परमात्मा ला जोहार हे] जेन साधू संत सवाँगे मोछ-गति ला पाके दूसर मन ला सत्य उपदेश देथे, अउ अपन सत्य गोतियार ला जान गये हें, अउ जेन सबके सच्चा गोतियार हे, वो परमात्मा ला पा चुके जन मन ला जोहार हे A
उरथी अनंतकाल, जग उवे बुड़े ताल, घेरी-बेरी जनम धरैया ला जोहार हे /
जस-जस करमन ]तस-तस भरमन, जग जीव नियाव करैया ला जोहार हे /
करम अउ जीवदल, नता-नित्य लोकतल, देव के अनुकूल रहैया ला जोहार हे /
गुन-करम-सुभाव, माने नइ जीवभाव, अइसन दुःख के भोगैया ला जोहार हे /
टीका-जेन सृष्टि के आदि काल ले ही अनंत हे, अउ जीव जगत रूपी ताल में उदित-अस्त होवत रहिथे, माने बेर-बेर ये भिन्ना जगत या भौतिक जगत में जनमथे, मरत रहिथे, वोला जोहार हे] जेकर जइसे करम होथे, वोला परमात्मा वइसने जोनी मन में भ्रमण कराथे, माने करम-जीव के भीतरी समाय वासना ही वोकर बेर बेर जन्म-मरन के कारन हे, जेन जीव के जइसे करम हे, वोला वोकर संकल्प के अनुसार वोला उही जोनी मन में भेजने वाले जनम देवैया]पक्षपातरहित] सम्यक न्यायकरैया परमात्मा ला जोहार हे]करम अउ जीवसमूह के सम्बन्ध नित्य सरलग अउ सबदिन सत्य सनातन हे, अउ सबलोक मन में एक जइसे प्रभाव करैया परमात्मा के अनुकूल आचरन करथे वोला जोहार हे]जेन सम्राट मन के सम्राट परमात्मा ला अहोभाव ले नइ माने, अउ जीव के गुन-करम-सुभाव ला मानथे, जानथे, अइसन हतभागी दुःखभोगैया ला जोहार हे A
जग के परम भल, जेन करे पल-पल, सतगुरु ज्ञान के देवैया ला जोहार हे /
तजवा के दुःख रोग, जेन हर कर सोग,अंतस के तमसहरैया ला जोहार हे /
शुभ सत बाचा बोल, अंतस नयन खोल, देवी सम्पद सब सवैया ला जोहार हे /
तपसी अउ रिखि-मुनि] सिद्ध जन अउ गुनि, अनुरागी के डोंगाखोवैया ला जोहार हे /
टीका-जेन हर पल प्रतिक्षण जगत के परहित करथे, अइसन ज्ञान देवैया सतगुरु ला जोहार हे] जेन दुःखरोग के कारण ला त्याग कराके परमअनुग्रह करथे, अइसन अंतरात्मा के अंधियार हनन करैया परम दयालु गुरुवर ला जोहार हे]जेन सबदिन सत्य अउ शुभ बचन बोल के अंधियार में भटके हुए मनखे मन के आत्मा ला परम प्रकाशपुंज परमात्मा के साक्षात्कार करवैया दैवीय संपदा मन के बढ़वार रखवारी करथे, वो गुरु मन ला जोहार हे] परम तपसी ऋषि-मुनि स्तर के सिद्ध-योगी अउ गुणधर मनखे जेन परमात्मा के प्रति अनुरागभाव रखथे, अइसन परमात्मा के अनुरागी मनखे के जिनगी रूपी डोंगा चलाके वो परम प्रभु तक पहुंचैया विद्वान अउ गुरुजन मन ला जोहार हे A
अंतस के मल मूल, जेन उखाने समूल, दोख दुःख बाधा उपकैया ला जोहार हे /
गुरु गोड धोय पानी ]पीके जेन होय ज्ञानी, गोड धूलि चन्दन लगैया ला जोहार हे /
मन के मइल हरे, अंतस आरूग करे, हाथ धर बाटके रेंगैया ला जोहार हे/
जेन गुरु संग चल, अडचन करे हल, कुबाट ले चेत के छेकैया ला जोहार हे A
टीका-जेन प्रकृति के प्रभाव में आके मइलाय आत्मा के मइल ला मूल समेत उखान के नाश करथे, अउ संसार रूपी सागर के दैहिक-दैविक-भौतिक तीनो ताप मन ले रखवारी करथे, अइसन सदगुरु ला जोहार हे]जेन गुरु के चरण धोय पानी पीथे, अइसन गुणीजन ला परम लाभ के अधिकार मिलथे] गुरु के गोड के धुर्रा ला माथ में चन्दन के जइसे धरके मन निर्मल करैया शुद्धआत्मा मन ला जोहार हे, जेन ज्ञानी गुरुजन आत्म ज्ञान के मार्ग के बाधा मन के बने ठउका जान थे, वो अपन शिष्य मन के संग चलत हुए वोकर आत्मलब्धि के बाधा मन ला दुरिहा करके आत्मतत्व ला जानना सुगम बनाथे, अउ जब कभू चेतना बिचलित होथे, तौ संभाल लेथे कुमार्ग ले मनखे ला छेकैया परम ज्ञानी गुरु ला जोहार हे A
जगत के दुःख भूले, अंतस नयन खुले, गोठ-बात में मनिझरैया ला जोहार हे /
आचरन करे देख, आँखी भूले मीन-मेक, परहित परनकरैया ला जोहार हे /
जेन पाये सतगुरु, हो जाए उठान शुरू, दोख-दुःख हरे उरथैया ला जोहार हे /
मुरुख पन बियाय, दुःख पंडित मिटाय, डर घुस्घुस के हरैया ला जोहार हे /
टीका-जेकर अंतरात्मा के आँखी खुले हे, अउ जेन संसार के दुखदल ला भुला के परमात्मा के परमपावन क्षेत्र में निवास करथे, अउ जम्मो जन हित बर अपन अर्जित ज्ञान रूपी मणि लुटाथे, वोमन ला जोहार हे]जेकर परमपवित्र आचरन ला देख के अउ वोकर वाणी-करम के प्रभाव ले दूसर लोगन भी अपन क्षुद्रता तजथें] अइसन सबके हित साधे परहित बर संकल्प करे महानुभाव ला जोहार हे] जेमन ला सद्गगुरु मिलगे अउ जेकर उठान होगे हे, जेकर दोष-दुःख के शमनउरथी होगे हे, वोमन ला जोहार हे] जेन आत्म ज्ञान पाके परम प्रभु में ही निवास करथे, अउ मूर्खता बियाय सबो दुःख नाश करके मन के सबो भय कुशंका मन के नाश कर डरे हे वोला जोहार हे A
सब शुभ गुन धर, गिंजरत नारी- नर, निज गुन ज्ञान के लुटैया ला जोहार हे /
दुःख सहिथे अपन, जगसुख लेथे प्रण, तेन जगभूषण होवैया ला जोहार हे /
देखे न इ पार दोस, धरे शुभज्ञान कोस, संत मया बाँटत घुमैया ला जोहार हे /
संतन बचन गंगा, उठत शुभ तरंगा, जगहित साज के सजैया ला जोहार हे /
टीका-सब्बो शुभगुन मन के धरैया सबदिन भ्रमणशील गुणधर विदुषी नर-नारी जेन अपन अर्जित गुन भण्डार ला जम्मो जन हित बर लुटाथे, वोमन ला जोहार हे, जेन संत सवाँगे दुःख सहन करत सब जगत ला सुखी करे के प्रण लेथे, अइसन जगतभूषण ला जोहार हे, जेन दूसर मन के दोष दर्शन अउ पक्षपात के बिगन सबके प्रति अपन मया अउ ज्ञानकोष ला जइसे भाव ले लुटाथे, अइसन ज्ञान-बिद्या के परम प्रचारक संत मन महात्मा मन अउ विज्ञ जन ला जोहार हे, संत अउ महात्मा मन के आप्तज्ञान रूपी बचन गंगा में उठत शुभ लहरा में जेन लहरावत ज्ञान लाभ लेथे, संसार ला सुंदर बनाय बर सुन्दर मनखे सुंदर वातावरण अउ सुंदर आचरन ले सजाय बर सबदिन प्रयत्नशील रहिथे, वोला sas जोहार हे /
पाप के हरन बर, जीव के तरन बर, मनखे ला शुभ में चलैया ला जोहार हे /
धरम में खम गाड़, पाप के जर उखाड]बरकस अचल रहैया ला जोहार हे /
संतन के कल्परुख, देये सब जगसुख]जगहित बचन कहैया ला जोहार हे /
सुनके संतन गोठ, अंतस ला करे पोठ, सत्संग धार में बोहैया ला जोहार हे /
टीका-भौतिक जगत में प्रकृति के संपर्क में आय के कारन होवैया सबो पाप मन ले मुक्त होय अउ जीवात्मा के उद्धार बर जेन शुभता में विचरथे, वोला जोहार हे]जेन धरम रद्दा में अडिग अचल खंभा असन अड़े रहिथे, अउ पापाचार अधर्म बाटला सबदिन छेंकथे, अइसन बलवंता शक्तिशाली अउ अचल धर्माचारी ला जोहार हे] संत रूपी कल्पवृक्ष सबदिन सबो सांसारिक महानुभाव के सुख देवैया होथे, अइसन सांसारिक मनखे के जिनगी ला सुगम बनाय वाले आप्तबचन गोठकार ला जोहार हे, जेन लोगन संत मन महात्मा मन के ज्ञान भरे आप्त बचन ला सुनके अपन आत्मा ला समृद्ध अउ सुदृढ़ बनाथे, अउ सतसंग के प्रवाह में बोहाथे, अइसन श्रद्धालु ला जोहार हे /
संतन मिलन गुन, अड़बड़होथे सुन, संत गुन सुभाव अथैया ला जोहार हे /
जड़ अउ चेतनजग, जीव छाय सब मग, जान परम प्रभु के भार रहैया ला जोहार हे /
सतसंग करे जाय,उही गुनिक कहाय, संतन के छाँव में रहैया ला जोहार हे /
कहूँ नइ बैरी-मीत, चाहे सब जग हित, समभाव जगत रहैया ला जोहार हे /
टीका-संत संगति के गुन अब्बड़ हे, येकर सेती सतसंग करके संत मन के आप्तवाणी ला सुने] संत के अथाह गुन-करम-सुभाव ला सामान्य मनखे कभू नइ जान सके, अइसन अथाह गुननिधि गुनी ज्ञानी संत मन ला जोहार हे] जड़ अउ चेतन जिहाँ तक संसार हे,सब में सबो ठाँव समभाव ले जीव व्याप्त हे, तिल भर ठउर भी जीव मन ले खाली नइ हे, जेन संसार ला ये प्रकार जानके परमात्मा में अपन सम्पूर्ण भार छोड़के ये संसार में बिगन कोनो प्रकार के लगाव-दुराव के लोकहित निमित सबो कारज ला करत जिनगी पहाथे वो संत ला जोहार हे]जेन मनखे सतसंगी होके सम्पूर्ण मुरुखपन त्याग के गुणधर होथे अउअबिद्या बियाय दुखदल के पार होके संत के छत्रछाया में सवाँगे ला समर्पित करथे a वोला जोहार हे]जेकर बर ये संसार में ना तो कोनो बैरी हे, ना तो कोनो संगवारी हे, जेकर आंखी समदर्शी होगे हे, जेन सबो संसार बर हितकामना करथे, अउ परहित कारज करत परमात्मा के नाम सुरता करत हुए सम अउ सहज भाव ले परमात्मा सत्ता में रमथे वोला जोहार हे /
पर बिपत में हँसे, बोली-ठोली ताना कसे, घर बाट भूले अनगैंहा ला जोहार हे /
परसुख देख जरे, अंतस बम्बर बरे, बिपत ला नेवता देवैया ला जोहार हे /
निंदा रस महारथ, सुहाय लबारी कथ, पाप कोठी अपन भरैया ला जोहार हे /
चौपट कर फसल, करा कस जावे गल, डाह इरखा जरमरैया ला जोहार हे /
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