Saturday, 23 May 2026

वेद सुमरनी जोहार ३

टीका-जेन दूसर के जिनगी में आय बिपत देख के हाँसथे अउ अपन व्यंग्य ले बिपतपरे मनखे के दुःख ला दुनपट करथे, अइसन सतमारग ले पतित मनखे जेन परमात्मा के मेर जाय बर निकले हे, फेर वोहर यात्रा करत-करत प्रकृति के संपर्क ले व्याप्त गुन मन के कारन चेतना मइलागे हे, अउ अपन परम धाम के पावन पबरित जात्रा ला भुलाके सांसारिक जंजाल में फंस के अपन मूल उद्देश्य ला भुलागे हे, अइसन रद्दा ले बिमुख आं गाव ले आय जीव ला जोहार हे, जेन परसुख ले इरखा भाव रखथे, अउ दूसर के सुख देख के जेकर भीतर इरखा डाह के आगी भरभर-भरभर बरे लगथे, अइसन कलुषित होय हुतात्मा जेन अइसे निम्न बेवहार करके अपन बर बिपत मन ला नेवता देथे, वोला जोहार हे] जेला पार निंदा चारीमें महारथ हे, अउ जेला असत बचन ही सुहाथे, ये प्रकार कुकृत्य करके अपन पापभण्डार ला समृद्धकरैया ला जोहार हे] जइसे करा हर फसल ला चौपट करे के पाछू सवाँगे भी नष्ट हो जाथे, वइसने दूसर ले इरखा द्वेष अउ दुर्भावना रखत हुए सवाँगे के नाशकरैया ला जोहार हे / वेद लक्ष्य बिन जाने, वेद पढ़े अउ ताने, वेद पढ़ मुरुख रहैया ला जोहार हे / जनमो के उवे पुन, तब मिले ज्ञान गुन, बिरला गुणधर होवैया ला जोहार हे / जगत कारन जान, पावै जेन मनुसान, ईश दरश जोग जागैया ला जोहार हे / धर बने शुभ रीत, ईश ला समरपित, नर तन के गति बनैया ला जोहार हे / टीका-जेन मनखे वेद के परम लक्ष्य ला जाने बिगन वेद ला पढ़थे, वोहर वेद पढ़ैया होके भी मुरुख के मुरुख ही रहिथे, अइसन हतभागी मनखे ला जोहार हे, जनम-जनम के पुन्य उदय होय में जेला विशेष ज्ञान अउ परमात्मा के परमअनुग्रह ले आत्मज्ञान पाय हुए हे, अइसन बिरला ज्ञानी ध्यानी संत ला जोहार हे, जेन ये चराचर जगत के परम कारन ला परमात्मा ला जानके परमात्मा ले साक्षात्कार करे के योग्यता पाय हे, वोला जोहार हे]जेन मनखे अपन आप ला समर्पित करके परमात्मा के उठाये उठथे, बइठाय बइठथे, चलाय चलथे, अइसन मनखे चोला के गति बनैया परमात्मा ला अपन जिनगी समर्पित सफल बनैया ला जोहार हे / करत सबो करम, फल तज रहे सम, प्रभु निज अंतस रमैया ला जोहार हे / परमात्मा में टेक, विषय ले मन छेंक, पबरित अंतस करैया ला जोहार हे / दिब्य सुख इन्द्री पार] करे बर बढ़वार, नाम गुन दल सुमिरैया ला जोहार हे / आरूग भगति कर, जेन उठथे ऊपर, भिन्ना जगबंधन कटैया ला जोहार हे / टीका-जेन मनखे सबो करम ला करत हुए करम फल त्यागी होथे, अउ परमात्मा ला अपन अंतस के कन-कन में रमैया वोला जोहार हे]जेन एकमात्र परमात्मा में अपन मन ला टेका के रखथे, अउ आने सांसारिक विषय मन ले अपन मन रोक के नित्य-सरलग ईश्वर तत्व में रमण करत हुए अपन आत्मा ला अधोगति ले उबार के उर्ध्वगति करावत हुए उद्धार करथे, वोला जोहार हे]जेन मनखे परम दिब्य दैवीय संपदाके परभाव क्षेत्र में जाके दिब्यसुख मन के बढ़वार करथे, अउ इन्द्रिय पार सुख मन ला पाके परमात्मा के नाम समूह अउ गुनसमूह सुरता करत-करत संसार के पार चले जाथे, वोला जोहार हे] जेन पबरित भक्ति करके अपन आत्मा ला ऊपर उठाथे, अउ भौतिकजगत के बंधन मन ला सहजता ले काटे में सफल होथे, वोला जोहार हे / परम प्रभु ला भर, सब कोती देख कर, सद्चिदानंद के पवैया ला जोहार हे / वेद ज्ञान हे बतात, सबो जग हित बात, वेद पढ़े सब ला कहैया ला जोहार हे / जेकर हे बुध हरे, अउ आने पूजा करे, परम बरं बिसरैया ला जोहार हे A प्रभु महिमा अं जान, मांगे भिन्ना जिनिसान,उथली बुध में भंवरैया ला जोहार हेA टीका-जेन मनखे परमात्मा के सुंदर छबि ला सबो ठाँव कन-कन में देखथे, अउ सबमें उहीपरमपावन प्रभु दर्शन करथे, अउ अपन आत्मा के परम आरूग अवस्था के कारन सद्चिदानंद पाथे, वोला जोहार हे, वेद ज्ञान बताथे, कि मनखे मात्र के कल्यान के भावना सबो ठाँव समय हे, अइसन पबरितकरैया अउ हितकर वेद के पठनपाठन बर प्रेरित करथे, वोला जोहार हे]जगत छाय माया द्वारा जेकर बुद्धिहरन कर लिये हे, अउ जेन लोगन वेदोक्त मार्ग ला छोड़ के दूसर के पूजा करथे, अइसन परम ब्रह्म के परमपावन संसर्ग वंचित प्रभु रद्दा ला भूले ला जोहार हे] जेन मनखे परमात्मा के उदारता बडप्पन अउ दानशीलता जानके भी सांसारिक सुख के भौतिक वस्तु मन ला परमात्मा ले माँगथे, जबकि परमात्मा मोछगति देवैया हे, अइसन मंदमति अउ उथलीबुद्धि वाले भटकन के वरणकरैया ला जोहार हे / देवे जे परम पद, जीव तै मितानी बद, जिनगी के डोंगिया खोवैया ला जोहार हे / भजे जेन पल-पल, उही होवै निरमल, इंद्रीदल सुघर हाँकैया ला जोहार हे / तन कस मन रस, जान प्रभु सरबस, आनंद दहरा डूबकैया ला जोहार हे / मन राखे मुरकेट, प्रभु ले करन भेट]मन तन अपन कसैया ला जोहार हे / टीका-जेन परमात्मा सबो वेद बाटजवैया मन ला परम पद देथे, ये संसार में केवल उही संगवारी हे, aकेवल वोकर ले ही मितानी के चाह रखो, अउ आशा रखो, ये मनखे देहरूपी डोंगा ला खोय बर उही परमात्मा नाम ओम ही पतवार हे, अइसन ओम रूपी पतवार में रमणकरैया परमदेव ला जोहार हे]जेन परम पबरित करैया परमात्मा के ये परमपावन ओम नाम जप-जपअपन चित्त ला निर्मल करथे, अउ अपन इन्द्रिय मन के समूह ला संयम ले हाँकथे, वोला जोहार हे]जेन छुद्र मनोकामना के प्रति अपन मन ला संयम ले कसथे, अउ अपन आत्मा में रमण करत सब कारन के कारन परमात्मा ला जानथे, अउ परमानंद रूपी समुन्दर में अचल रहत हुए परमात्मसत्ता माने सवाँगेसत्ता के गोता लगैया ला जोहार हे, जेकर परमात्मा ले मिलन के प्यास बढ़गे हे, अउ अपन मन ला विषय मन के भयंकर प्रभाव ले बचा के संयम के आगी में इन्द्रिय मन के उपद्रव ले उपजे बेवधान ला स्वाहा करथे, अउ मन-तन ला सरलग परमात्मा के धियान में लगा के देह के साध सधौरा मन डहर ले मन ला मोडथे, वोला जोहार हे / जेकर सीमित फल, छिनभंगु अमंगल, तेला पूजे बर बरजैया ला जोहार हे / नाशवान दैव तन] नही हे अमरपन, सरग ले तरी खसलैया ला जोहार हे / बरम देवता पद, उतरे बेरा पूरत, पद के देवैया उतरैया ला जोहार हे / क्षमा देवे क्षमावान, मोला मंदमति जान, कण-कण जगत बसैया ला जोहार हे / टीका-जेन करम के फल सीमित, छिनभंगुर अउ अमंगलकरैया हे, अइसन पूजन पद्धति बर सचेत करैया प्रबुद्ध जन ला जोहार हे] भिन्नजगत में सव्र्गीय देव देहधारी जेन पुन्य क्षीण होय में देवत्व ले खसल के मरनलोक में फेर आथे, वोला जोहार हे, ब्रह्म देव पदवी के पुन्य काल तक भोग पाछू समयकाल पूरा होय में ब्रह्म पद ला छोड़ा के पदमुक्तकरैया सर्वशक्तिमान परमात्मा ला जोहार हे, जोहार वंदना में जेन कोनो के वंदना अउ जोहार चूक होगिस होही तौ मोला मंदमति जानके क्षमादान देही, ये चराचर जगत में बसने वाले जीव-अजीव ला जगत के कन-कन ला मोर असन अकिंचन के बारम्बार जोहार हे / सब रखवार जेन, जग भरतार जेन,वोकर ले मया ला बढ़ाथे वेद बचना / भटकन जिनगानी, बरसे ओरछा पानी, जीव के मरम ला भंजाथे वेद बचना / दुःख गोती-पोथी छोरे, सुख संग होती जोरे, सवांगे जनास ला जनाथे वेद बचना / माटी मटियाय झन, धूर में सनाय झन, जगमग होये ला सिखाथे वेद बचना / टीका-जेन परमात्मा सबके रखवार हे, अउ सबो संसार के एकमात्र गोसैया हे, ये वेद बचन उही परमात्मा ले मया बढ़ाय वाला ग्रन्थ हे] जिनगी ला भटकन ले बाहिर निकाल बिगन सकेल के करिस बरसा में ओइरछा ले बोहावत पानी जइसे ये मनखे जिनगी के मरम ला गुनान करे बर प्रेरित करैया ग्रन्थ वेद ही हे]जीव भिन्नाजगत में आके नाना प्रकार के दुःख ताप मन ले झंवावत रहिथे, ये दुःख अभिन्न गोतियार नोहे, दुखदल के संवाहक हे, भलुक दुःख ग्रंथी ला समूल उखान के सबो उत्तम मौलिक सुख ले सम्बन्ध जोड़ने वाले परमात्मा के साम्हू हे, सुख के संग अपन अस्तित्व ले जुड़े बर आत्मज्ञान के विशुद्ध अनुभव ला बतैया वेद ही एकमात्र ग्रन्थ हे, पंचमिंझरा बने पुतरी जेन माटी ले बने हे, उही माटी में धूर में सना जाय वोकर पहिली अपन आत्मबल प्रकाश ले अपन अस्तित्व ला जगमग करे के विधि बतैया ग्रन्थ वेद हे /

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