"कनकधारा स्तोत्र छत्तीसगढ़ी भावानुवाद"
छन्द - बसंततिलका छन्द
लाला ललालललला ललला ललालाला
डारी तमालरुखवा डुँहड़ू छबाये।
भौंरा रहै जस बसे जिनगी पहाये।।
तेने प्रकार बगरे हरि दीप्तिमाया।
रोमांचछाय संभरे दगदग्ग काया।
तेने उजास तन में कमला समाये।
देबी उही दमक में सुख ला लुटाये।।
ऐश्वर्य अंग भर हे बसवार दाई।
मोरो सुमंगल करै नयना सहाई।।
भाथे सदा सहजहा ब्रजराज सेवा।
दानी दयालु कहिथें सब देव-देवा।।
मोला घलो शरण में रख लै उदारी।
मैं दीनहीन दुखिया हरि के पियारी।।
भौंरा झुमै कमल ज्यों मधुझोर पाये।
मोहै मया हरिप्रिया छबिदिब्य छाये।।
देखै सुदीब्य प्रभु ला मन में बसावै ।
माया मयामहलिया ममहात जावै।।
डोलै महाकमल ज्यों दलमाँझभौंरा।
मिट्ठी मयामधुरसा चुहके सधौरा।।
तेने प्रकार कमला हरिश्री पुजारी।
देखै मुखारविंद ला सजनीसुवारी।।
आवै मया मचल के फिर फेर जावै।
मोहाय रूप सँइया हियलाज खावै।।
लक्ष्मी समुन्दरधिया हरिमुग्धनैना।
जेला निहार पनके सुख-शांति-चैना।।
मोहै जमो जगत ला शुभदृष्टिमाला।
संपत्ति धान्यधन दै सुखवृष्टि वाला।।
गोसान देवदल के, सुरराज सब ला।
देवावय इन्द्रपदवी धनधान्य कमला।।
नामी मधुमार रकसा अरि के हनैया।
आनंदकंद प्रभु के हियरासुहैया।।
भाई सगे धनरमा अरविन्दनीला।
आधाखुले नयन ले किरवार पीला।।
मोला घलो निहारै बनके सहाई।
जेला मनात जग हे धन हेत माई।।
लोमे मयाबिबस श्रीहरि दिव्यआँखी।
देखे लगा टकटकी मधुभाव राखी।।
आनंदकंद हरि के लकठा लजाये।
भौं ला भँवाय पुतरी तिरछा नचाये।।
सोये समुन्ददुधिया शुभशेषशय्या।
गोपाल गोसइन जै जयकारमय्या।।
आँखीउदार करके धनधान्य देवै।
सब्बो दलिद्दर मिटा अँगियाय लेवै।।
छाती सजे सजन के मणिमंडमाला।
तेमा रमे रमनियाशुभ सिन्धुबाला।।
मालालरी धुकधुकी सजना सजाये।
मायामहासुख मया हिय संचराये।।
कुंजेश्वरीकमल हे ! कमनीय प्यारी।
मालाकटाक्ष बर दै हरिश्रीसुवारी।।
घोपे घटाघहरहा घनमेघ छाये।
तेमा लउक्क जइसे बिजली समाये।।
छाती मँझार करिया तइसे बिराजे।
दैदीप्य दीपत रमा हरि संगराजे।।
लोकादि दिब्यसिरजे जगती बनाये।।
आनंद-वंशभृगु ला बढ़के दिलाये।
कल्यान मोर कर दै सुमरौं जुहारौं।
जानौं सुभावसिरतो अँजुरी पसारौं।।
देबी समुन्दरधिया सब विश्वपाया।
आँखी मयाअलसहा गतिधीरमाया।
स्वामीतिलोक हिरदे धनदेवि जेमा।
पाये अनंग पहिली घँव ठाँव तेमा।।
दाई दयाबति उही धनलाभ लावै।
द्रब्यादि फूलबरसै सुख-शांति छावै।।
देबीदयालु सजनी हरिश्री गुहारौं।
प्रारब्ध के अशुभता पलटे पुकारौं।।
मेघा सरीख नयना प्रभुप्राणप्यारी।
चालै दया सरसहा जुड़हा-बयारी।।
दुष्कर्म ला पलटके बिपदा भगावै।
बोहाय धार-धन के शुभ-लाभ लावै।।
ज्ञानी-विशिष्ट-मनखे मइया-मयारू।
पावै दया दपट के तर जाय पारू।।
रोपे-रहे सहज ही सुख-स्वर्ग पावै ।
दाई-दयालु-लछमी सुख ला बढ़ावै।।
पद्मावती पदुम के फुलवा बिराजै।
दैदीप्यदिब्यबदनी रबि देख लाजै।।
माई मयामहमही शुभता बढ़ावै।
आशापुरो भगत के बढ़ती करावै।।
मायामहासरती जगसृष्टिबेला।
ब्रह्मा कहाय तिरिया गढ़शब्द खेला।।
पोसे रखे जगत ला जब विष्णुलीला।
लक्ष्मी बने बइठ दे सुख नित्य पीला।।
मायामहाप्रलय में रहि संग भोले।
दुर्गामहाभगवती शिवभाव डोले।।
देबी त्रिलोकगुरु श्रीहरि के सुवारी।
पोसै बिचित्रजगती हरिफूलवारी।।
मोहै रिझाय हरि ला नित मोटियारी।
जोहार मोर पँहुचै कमला उदारी।।
प्रारब्ध के करम के फल भोगवैया।
जोहार धोकर करौ श्रुतिरूप मैया।।
शोभातसिन्धु गुन तै रतिरूपमाया।
जोहार धोकर करौं कर छत्रछाया।।
जोहार भेट कमला, कमलेच काया।
जोहार सिन्धु बिटिया, जगछाय माया।।
जोहार चन्द्र बहिनी, हरि अंग-अंगी।
जोहार सोम बहिनी, हरि रंग-रंगी।।
जोहार विष्णु घरनी, पिरिया पियारी।
नारायणी नमन हे, जगनाथ नारी।।
सोना मढ़े बइटकी, शुभ बइठैया।
भूमंड़लीय मुखिया, जगधार मैया।।
देवी दया दपट दे, बड़का उदारी।
शाडृघायुधा हरि के, घरनी पियारी। ।
जोहार भेट लुगरा, चुक लाल वाली।
जोहार भेट हरि के, फुलवारी माली।।
नारायणी जगपितु, हरि वक्ष माड़ा।
जोहार भेट करथौं, झन आय आड़ा।।१६।।
कांता विराट हरि के, सबलोक दाई।
आँखी हवै कमल से, जगती सहाई।।
पूजै व देव मन हा, तिय नंदलाला।
जोहार देबि करथौं, करबे दया ला।।
सम्माननीय कमला, धन-धान्यधानी।
आँखी लगै कमल से, सुख सिद्धिदानी। ।
आनंद मोद बरसा, तन में करैया।
साम्राज्य आदि सब दे, मल के हरैया।।
जम्मोच पापदल ले, पल में तरैया।।
मोरे सदादिन बने, जबरा थमेरा ।।
जोहार वंदन करौं, सबबेर घेरा।।
जोहार अवसर मिले, सब बेर मोला।
बंदौ सदा चरन ला, तर जाय चोला।।
पावै कटाक्ष किरपा, कमला उपासी।
पूरे मनोरथ मिले, धन-धान्य-रासी।।
पाके कृपा भगवती, सुख जाग जावै।
बिस्तार होय धन के, महिमा बढ़ावै ।।
श्री विष्णुदेव हरि के, हृदयेश्वरी ला ।।
बंदौं शरीर मन ले, बचनादि माला ।।
नारायणी कमल में, रहिवास तोरे ।
नीला धरे कमल तैं, सुख सिद्धि जोरे।।
सारी सफेद दग ले, पहिरे भवानी।
माला सुगंध झम ले, सँभरे सयानी। ।
झाँकी सुहावन लगे, सबले अनोखा।
ऐश्वर्य आदि सब दे, तिहुलोक चोखा।।
होके प्रसन्न बर दे, जय हो उदाली।
जोहार तोर करथौं, सुखसिद्धि वाली।।
मानी-धनी कनक के, करसा सजा के।
आकाशगंग जल ला, भरके चढ़ा के ।
चोला सुदिव्य हरि के, अभिषेक होवै।
जोड़ा सरोज पग ला, गुन गात धोवै।।
जे सर्वलोक मुखिया, हरि हे उदारी।।
तैं हा रमा रमनिया, उँकरे सुवारी।।
तैं हा समुद्र धियरी, जग जन्मदाती ।
लक्ष्मी महाभगवती, सुख दे सुहाती ।।
बेरा पहात परथौं, नित पाँव तोरे।
ओली सुद्रब्य भर दे, हित हेतु मोरे।
नारी नरायन ददा, हरि अब्जनैना।
दाई दया उलइया, सुन दीन-बैना।
मैं हौं अनाथ ररुही, सबले अभागी ।
तौ पात्र हौं सहज ही, बर दे सुभागी।।
पूरा तरंग उमड़ा, करुणा करैया ।
मोला निहार कमला, धन के धरैया ।।
माया त्रिलोकजननी, त्रयवेद रूपा ।
छाया सदैव रखबे, भव अंधकूपा।।
जेने मनुष्य करही, स्तुति नित्य तोरे।
वोला महाभगवती, सुख में चिभोरे।।
सौभाग्य सिद्धि धन के, छँइहा बसाये।
विद्वान लोग कहिथें, सनमान पाये ।।
आने सुविज्ञ जन भी, मनभाव लेये।
आथे सधाय निरखे, सुखलाभ देये।।
आचार्य शंकर रचे, जब ये स्तुती ला।
जे तीन बेर पढ़थे, फरिया मती ला।।
देथे कुबेर जइसे, धन धान्य माया ।
हो जाय मंडल बड़े, रहि छत्रछाया।।
शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन
॥ इति श्रीमद्द शंकराचार्य विरचित कनकधारा स्तोत्र सम्पूर्णं॥
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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