Sunday, 19 October 2025

झुलना बँधाये बिन डोर हो

नत्ता के झुलना में धीरे-धीरे झुलबे,
झुलना बँधाये बिन डोर हो।
सुरता पैडगरी में धीरे धीरे बुलबे, 
हपटे झन पावै गोड़ तोर हो ।। 
जगअड़गसनीफाँसी अरोये जिउ, 
नइ हे भलाई इहाँ तोर हो। 
दसे फूलपौंदर सब खुँद नाहकत, 
पथरा कस जग कठोर हो ।। 
दँगर-दँगर तोर रेंगे के टकर परे,
रेंग देख-ताक के निटोर हो ।
निकल-निकल अब झन चिटको बिलम,
रुँधना बँधना सब छोर हो।
जगरस करु कसा चुरचुर नुनछुर, हरिनाम रस मन बोर हो।

शुभचन्द्रसूर्या शोभामोहन श्रीवास्तव 

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