दोहा
अद्धर बिगन अधार के, कोन करै किरवार।
छछले बर रुख खोजथे, मन के नार बिंयार।।
जरै नौकरी चाकरी, जरै कुटुम परिवार।
अउ ये जम्मो जग जरै, जब जीव जरत हमार।।
ओलीभर पइसा धरे, मन नइ साध जगान।
धनधोगानी जोर के, झन रच खरही मान।
तोर नाम के काम हे, तोर धाम ले काम।
तोर बिगन बिरथा हवै, प्रान चेतना चाम।।
तोर बिगन का जीत अउ, तोर बिगन का हार।
तोर बिगन का सुखसजन, तोर बिगन संसार।।
गाँव गाँव नदिया फिरत, खोजत सागर बाट।
ठाँव ठाँव अंतस फिरत, उतरे बर हरिघाट।।
टेड़ेंगबेड़ेंग नदिया फिरत, एकदिन समुन्दर समाय।
त इसे कतको जीव फिरै, जा प्रभु सर्न थिराय।।
टिप-टिप ले भर तेल ला, कइना दीप जलाय।
पाके प्रियतम ला अपन, लहरलहर लहराया।।
तेलभरे दियना जला, जब करथे रतजाग।
तप कइना करथे कठिन,तब लहराथे भाग।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
०७/०९/२०२३
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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