Tuesday, 5 August 2025

दोहा :- मन के नार बिंयार।।

दोहा


अद्धर बिगन अधार के, कोन करै किरवार।

छछले बर रुख खोजथे, मन के नार बिंयार।।


जरै नौकरी चाकरी, जरै कुटुम परिवार।

अउ ये जम्मो जग जरै, जब जीव जरत हमार।। 


ओलीभर पइसा धरे, मन नइ साध जगान।


धनधोगानी जोर के, झन रच खरही मान। 



तोर नाम के काम हे, तोर धाम ले काम। 

तोर बिगन बिरथा हवै, प्रान चेतना चाम।। 


तोर बिगन का जीत अउ, तोर बिगन का हार। 

तोर बिगन का सुखसजन, तोर बिगन संसार।।


गाँव गाँव नदिया फिरत, खोजत सागर बाट।

ठाँव ठाँव अंतस फिरत, उतरे बर हरिघाट।।


टेड़ेंगबेड़ेंग नदिया फिरत, एकदिन समुन्दर समाय।

त इसे कतको जीव फिरै, जा प्रभु सर्न थिराय।।


टिप-टिप ले भर तेल ला, कइना दीप जलाय। 

पाके प्रियतम ला अपन, लहरलहर लहराया।। 


तेलभरे दियना जला, जब करथे रतजाग।

तप कइना करथे कठिन,तब लहराथे भाग।। 

 

शोभामोहन श्रीवास्तव 

०७/०९/२०२३ 

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