मन उन्डा ऊना रीता कर, हरहिन्छा हो जाना रे।
कठवा कस ला घुन्ना खाना, लोहा ला मुरचाना रे।
तोरी मोरी जादा झन कर, सबके एक घराना रे।।
परकम्मा कर घानीमूनी, अपन गाँव घर जाना रे।।
चूरी कस चुटकी नत्ता में, हिरदे नइ अरझाना रे।
बासत सुग्गा कहत रात दिन, बेरा नहीं गँवाना रे।।
जहर घुरे ये पुरवइया में, काया धरम निभाना रे।
उहें अभरही सब बटचल्ला, जेला जिहाँ जोगाना रे।
जइसे बोंबे तइसे लूबे, मन में इही भँजाना रे।
जगत चटक के धुर्रा धरना, अउ मुड़ धुन पछताना रे।
एकलीबाट चलत पैडगरी, परतछ हरि सपड़ाना रे।।
अरे तरे के नगर गाँव में, अउ नइ फेर झपाना रे।
शोभामोहन नाम सुमिर के, भवदहरा तर जाना रे।
शोभामोहन श्रीवास्तव
विक्रम संवत २०८१
बइसाख महीना
परकम्मा कर घानीमूनी, अपन गाँव घर जाना रे।।
चूरी कस चुटकी नत्ता में, हिरदे नइ अरझाना रे।
बासत सुग्गा कहत रात दिन, बेरा नहीं गँवाना रे।।
जहर घुरे ये पुरवइया में, काया धरम निभाना रे।
उहें अभरही सब बटचल्ला, जेला जिहाँ जोगाना रे।
जइसे बोंबे तइसे लूबे, मन में इही भँजाना रे।
जगत चटक के धुर्रा धरना, अउ मुड़ धुन पछताना रे।
एकलीबाट चलत पैडगरी, परतछ हरि सपड़ाना रे।।
अरे तरे के नगर गाँव में, अउ नइ फेर झपाना रे।
शोभामोहन नाम सुमिर के, भवदहरा तर जाना रे।
शोभामोहन श्रीवास्तव
विक्रम संवत २०८१
बइसाख महीना
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