Wednesday, 15 May 2024

सुरुज संग जग ला ऊना अउ, सुरुज संग बुड़ जाना हे। (भजन)

सुरुज संग जग ला ऊना अउ, सुरुज संग बुड़ जाना रे।
मन उन्डा ऊना रीता कर, हरहिन्छा हो जाना रे।
कठवा कस ला घुन्ना खाना, लोहा ला मुरचाना रे। 
तोरी मोरी जादा झन कर, सबके एक घराना रे।। 
परकम्मा कर घानीमूनी, अपन गाँव घर जाना रे।।
चूरी कस चुटकी नत्ता में, हिरदे नइ अरझाना रे।
बासत सुग्गा कहत रात दिन, बेरा नहीं गँवाना रे।।
जहर घुरे ये पुरवइया में, काया धरम निभाना रे।
उहें अभरही सब बटचल्ला, जेला जिहाँ जोगाना रे।
जइसे बोंबे तइसे लूबे, मन में इही भँजाना रे।
जगत चटक के धुर्रा धरना, अउ मुड़ धुन पछताना रे।
एकलीबाट चलत पैडगरी, परतछ हरि सपड़ाना रे।।
अरे तरे के नगर गाँव में, अउ नइ फेर झपाना रे।
शोभामोहन नाम सुमिर के, भवदहरा तर जाना रे।

शोभामोहन श्रीवास्तव
विक्रम संवत २०८१
बइसाख महीना 

No comments:

Post a Comment

संस्कृत राम स्तुति

शुद्ध संशोधित रचना-राम-स्तुतिः" ` लोभो नास्ति मोहो नास्ति, शोको नास्ति कामः। अपमानस्य चिन्ता, न पश्यति च दक्षिणं न वामम्॥ रात्रिंदि...