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रे मन हरि
सुमरन करना
**********************************
जग अरझे बरजे
हौं तैं झन,रोग बिसा धर ना ।
छोड़ सबो परपंचीपन
ला,हरि सुमरन कर ना।।
रे मन हरि
सुमिरन कर ना..................
घेरी-बेरी
घानी-मूँदी,फोकट झन फिर ना।
कोनो अइसे
कोनो वइसे,तोला का करना।।
रे मन हरि
सुमिरन कर ना...............
ब्यापै नइ का
अलहन धरके,पशु जइसे चरना ।
मृगतृष्णा बर
निंदरत हावस,अंतस के झरना ।।
रे मनहरि
सुमिरन कर ना ..............
काबर तैं
मंजूर करे हस,बिसयन जग जरना ।
पाप पुन्न के
पटक मोटरी, अगर कहूँ तरना।।
रे मन हरि
सुमिरन कर ना ...............
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
जय शिवशंकर
जय शिव शंकर, जय हर हर ।
जय अभयंकर, जय हरहर ।।
जय शिव शंकर, जय हर हर ।
जय प्रलयंकर, जय हर हर ।।
जय शिव शंकर, जय हर हर ।
सत शिव सुंदर, जय हर हर ।
जय शिव शंकर , जय हर हर ।
भूतादिक घर, जय हर हर ।
जय शिव शंकर, जय हर हर।
जग नियमनकर,जय हर हर ।
जय शिव शंकर, जय हर हर ।
शितिकंठ अमर, जय हर हर।
जय शिव शंकर, जय हर हर ।
अनगढ़ अवढ़र, जय हर हर ।
जय शिव शंकर, जय हर हर ।
अज अनघ अछर, जय हर हर ।
जय शिव शंकर, जय हर हर ।
तुम डमरूधर, जय हर हर ।
जय शिव शंकर, जय हर हर ।।
तुम भव दुखहर, जय हर हर ।
जय शिव शंकर, जय हर हर ।।
तन पर मणिधर, जय हर हर ।
जय शिव शंकर, जय हर हर ।।
सिर गंग लहर, जय हर हर ।
जय शिव शंकर, जय हर हर ।।
शशि शुभ्र
शिखर, जय हर हर ।
जय शिव शंकर, जय हर हर ।।
शोभामोहन
१५/०३/२०२०
रामधुन शंकर
छंद 16/10
राम रमा के
पिया रमइया, राम राजा राम ।
जग मा अजगुत
खेल करइया,राम राजा राम ।।
पाप बैर अपराध
मिटइया, राम राजा राम।
जेठ मँझनिया जुड़हा
छँइया, राम राजा राम ।।
शोभामोहन
१४/०३/२०२०
पाहँदा
गोदना गीत
का तोला देवंव
बेटी, मया के चिन्हारी ।
गोदना गोदा ले
रे ,मोर राजदुलारी ।।
चूरी चूरा देहूँ
बेटी,
टूटी फूटी
जाही ओ ।
पइसा कउड़ी
देहूँ,
खरचा होही
सिराही ओ ।।
मरत जीयत , संगदेवा
संगवारी ।
गोदना गोदा ले
रे, मोर राजदुलारी ।।
लोहा मुरचाही
बेटी,
काठ घुना खाही
ओ ।
सोन चाँदी
देहूँ तेनो,
टूटही खियाही
ओ ।।
काटे झन सकै
जेला, बेरा के कटारी ।
गोदना गोदा ले
रे, मोर राजदुलारी।।
सतरंग लुगा
देहूँ ,
रंग छूट जाही
ओ ।
घर बारी
ब्यारा देहूँ,
पर पोगराही ओ
।।
सब हे नसनहा
रे, मोर सुकुमारी ।
गोदना गोदा ले
रे मोर राजदुलारी ।।
पीरा हे जगत
भर ,
आही तेन पाही
ओ ।
इही गुन लेबे
पीरा ,
मन ला मड़ाही ओ
।।
सोच गुन देवत
हौं मैं महतारी ।
गोदना गोदा ले
रे, मोर राजदुलारी ।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
करत हवय
चुलकाय असन
हलन चलन माते
कस झुमरत,
ठिठकन तक
बउराय असन ।
तोर बिगन ए कंचन
काया
रहय पिया
अइलाय असन ।
सब पीरा के
मान होत हे ,
लागत नही
पिराय असन ।
हाथ धरे हस
जब्बर तँय हा ,
दुनिया करय
गिराय असन ।।
हाँसे थूँके
चाल चलन ला
होवत जमो
थिराय असन ।
मन के भाव मा
पाला परगे ।
होगे चेत हराय
असन ।
कोंवर भाव मा
करा गिरत हे,
छाती लगत
चिराय असन ।
चमकत सुकुवा
बेर पहाती,
बेरा घुँचत
बताय असन।
सेंदुर लगे
बिहिनिया सँझा,
करत हवँय
चुलकाय असन।
नरी रुँधागे
अब का बोलँव,
सुध करत
हुरियाय असन
मन में संसो
सँचरत सरभर
जिनगी सासँ
हराय असन ।।
शोभामोहन
अतका व्याकुल
हो मन मोर
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प्रभु दरसन
पाये बर तोर ।
अतका व्याकुल
हो मन मोर ।।
बूड़त मनखे साँस
लिये बर, करै जस उदिम सजोर ।
सतही नारी पति
बर व्याकुल, जइसे मन क्रम जोर ।।
प्रभु दरसन
पाये................................
सूम मनुख
धन-धोगानी मा, रखै चेत ला
बोर ।
बिस कस बिसय
बिसयी ला भावै, करै प्रपंच अथोर ।।
प्रभु दरसन
पाये................................
शोभामोहन करै
केलौली, मया ल आगर
घोर।
दिन दिन छिन
छिन सरलग बाढ़ै, मया गढ़ावै तोर ।।
प्रभु दरसन
पाये ................................
शोभामोहन
राम भजन कर ले
रे मनवा
राम भजन कर ले
।।
सब करवाइन
हुकुम बिगारी।
कोनो नइ देइन
बनिहारी ।।
कुछु अरजन कर ले रे
मनवा राम भजन .......
दुख पीरा के
गीत बनाये ।
अउ भैरा जग
मेर चिचियाये ।।
दूसर मन कर ले
रे मनवा राम भजन........
एक परत अउ
दाँव लगा ले।
चुलुक मन हरि
छाँव लगा ले।।
चोला धन कर ले
रे मनवा राम भजन ...........
शोभामोहन
१६/०१/२०२०
भाँवरमाछी बन
जा रे मन,
राम नाम मधु
छाता मा।
असलग तोर उही
भर हावय,
लरा-जरा जग
नाता मा ।।
बइठे रहिथे भाँवर
माछी।
छाता बिन मा
बिन बाँधे आँछी।।
कतको संगी
साथी तबले परै न बाती बाता मा।
भाँवरमाछी बन
जा रे मन,राम नाम मधुछाता मा।।
फूलझोर चूहके
बर जावै।
फेर लहुट ब
इठै सुख पावै।।
कभू मोहावै
नहीं बयाके,रसपराग के दाता मा।
भाँवरमाछी बन
जा रे मन,राम नाम मधु छाता मा।।
शोभामोहन
भाँवरमाछी बन
जा रे मन,
राम नाम मधु
छाता मा।
असलग तोर उही
भर हावय,
लरा-जरा जग
नाता मा ।।
बइठे रहिथे भाँवर
माछी।
छाता बिन मा
बिन बाँधे आँछी।।
कतको संगी
साथी तबले परै न बाती बाता मा।
भाँवरमाछी बन
जा रे मन,राम नाम मधुछाता मा।।
फूलझोर चूहके
बर जावै।
फेर लहुट ब
इठै सुख पावै।।
कभू मोहावै
नहीं बयाके,रसपराग के दाता मा।
भाँवरमाछी बन
जा रे मन,राम नाम मधु छाता मा।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
२८/०७/२०२०
तोर भरोसा
गाड़ी रजहा राम हे ।
सोग दया मर
करदे पार।
चाहे कहूँ नरक
मा डार।।
तरे मरे ले
मोला नइ कुछु काम हे ।
तोर भरोसा भवजल
ड़ोगा राम हे ।।
भीतर बाहिर
तँही समास।
बंधना कसस अउ
ढ़िलियास ।।
बंधनछोर दयालू
तोरे नाम हे ।
तोर भरोसा
भवजल ड़ोगा राम हे ।।
शोभामोहन
०६/०९/२०२०
तान गँवागे
सुर छरियागे,
टूटत बदन
तमूरा हो ।
साँस थिरागे
आस सिरागे,
बेरा बनगे
छूरा हो ।।
कोनो कलपत कोनो
रोवत,
बेरा होगे
पूरा हो ।
जस कीरत के धज
फहरत हे,
सुरता कलश
कँगूरा हो ।।
पिया पियारी
महल अटारी,
छूटत टूरी
टूरा हो।
पाँचो जिनिस
अपन कुल मिलगे,
भेजिस खबर
हजूरा हो ।।
कोनो हीरा
कोनो कंकर,
कोनो कुकरी
सूरा हो ।
शोभामोहन मन
मन कर ले,
जगत जमूगाफूरा
हो ।।
शोभामोहन
२०/११/२०२०
चल रे मन
सब छोड़ छाड़ अब,
साध पुरै
ना सँउक बुताय ।
बने गीनहा
दूनो घटत हे,
एक बरोबर
जगत सराय।।
कोनो मा
सुख कोनो मा दुख,
तोरे मन सौ
भाव भँजाय।।
चल
शोभामोहन मन ले घुँच,
सुते भाग
अपन फहराय।।
शोभामोहन
सिय जू बिहतरा
के मड़वा,बड़ सुहावत हावय।
जनक के राज
महलिया, मन भावत हावय।।
हरियर भिरहा
के बाँस मँगाये राजा।
जनकपुरी सजत, बजत मंगल
बाजा।।
सरग ले उतरे
सुवासिन, मंडप लानत हावय।
सिय जू बिहतरा
के मड़वा,बड़ सुहावत हावय।
चारो बहिनी ला
धर, अँगरी चलाये ।
तेल हरदी चुपर
हाँसै गोठियावै ।।
नहडोरी नेंग
होत अँगना,तिय नहवावत हावय।
सिय जू बिहतरा
के मड़वा,बड़ सुहावत हावय।
चिकट मा ठाढ़े
राजा जनक सुनैना।
सब कुँवरी
सुघर हावय फूलकैना।।
द्वार बजत
बाजा गड़वा,जीव हरसावत हावय।
सिय जू बिहतरा
के मड़वा,बड़ सुहावत हावय।
शोभामोहन छबि
सिय बसाये ।
अजगुत रूप गुन
कहि नइ पाये।।
सिय जू बिहतरा
के मड़वा,बड़ सुहावत हावय।
सिय जू बिहतरा
के मड़वा,बड़ सुहावत हावय।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
०६/०७ /२०१९
गजावली
1222 1222 122
ललालाला
ललालाला ललाला
अवधपति राम के
दरबार जाबो ।
करत हम जोर से
जयकार जाबो।।
धरे बर नेव
मंदिर नेवता दे,
बलाये हे हमर
सरकार जाबो।।
असेती वो भगत
बर सोग करथे,
दया ले ओकरे
भवपार जाबो।।
हमर प्रभु के
महामंदिर बनत हे,
मड़ाये बर ईटा
दू चार जाबो।।
चलन्ता अउ
नियन्ता ला जगत के,
करे बर भेंट अउ
जोहार जाबो ।।
शोभामोहन
०१/०८/२०२०
(13) गगनांगना छंद [सम मात्रिक
लाला लाला
लाला लाला, लालल लालला ।
विधान – 25 मात्रा, 16,9 पर यति, चरणान्त में 212 दो-दो चरण
तुकांत l
छोड़ सबो सुख
राजमहलिया, जावत राम हे ।
नर चोला धरके दुख
गलिया, जावत राम हे।।
तारत पथरा बने
अहिलिया, जावत राम हे ।
बाँटत पिरित
दया ओदलिया, जावत राम हे।।
मात पिता के
बचन निभाये, जावत राम हे ।
ऋखि मुनियन के
जीव बचाये, जावत राम हे।।
पुन फल बाँटे
सुख बगराये, जावत राम हे ।
नेम धरम ला
थाप बड़ाये, जावत राम हे ।।
शोभामोहन हर
सुख पाये, गावत राम हे ।
मगन अपन धुन
में बइहाये, गावत राम हे।।
बेरा घेरा ले
तिरियाये, गावत राम हे ।
नाम लहरगंगा
लहराये, गावत राम हे ।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
२४/०८/२०२०
खुश्बूविहार
कालोनी अमलेश्वर
रायपुर
तैं तो पूरा
कस पानी उतर जाबे रे ।
तैं तो पूरा
कस पानी उतर जावे रे ।
ए माटी के घरघुंदिया
उझर जाबे रे ।।
जीव रहत ले
मोहलो-मोहलो,काया के का मोल ।
छूट जही तोर
राग रे भौंरा,बिरथा तैं झन डोल ।।
आही बेरा के
गरेरा तैं बगर जाबे रे ।
तैं तो पूरा
कस पानी उतर जाबे रे ।।
हाड़ा जरही मास
टघलही,जर बर होबे राख।
बाचे रही तोर
बानी जग में,तैं हा लुकाले लाख ।।
पाँचो जिनीस
में सरबस मिंझर जाबे रे।
तैं तो पूरा
कस पानी उतर जाबे रे ।।
जेन फूल ले
गमकत हावै,जिनगी के फुलवारी ।
काल रपोटत
जाही सबला,देखबे ओसरी पारी ।।
अरे डुँहडू
तहूँ फूल बन झर जाबे रे ।
तैं तो पूरा
कस पानी उतर जाबे रे ।।
सक के रहत ले
राम भजन कर,छिनभंगुर संसार ।
अगम हे दहरा
ऊँचा लहरा,धुंँकना धुंँकत बयार ।।
शोभामोहन रटन
कर तर जाबे रे ।
तैं तो पूरा
कस पानी उतर जाबे रे ।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
अगम मा बाजत
बाँसुरिया
अगम मा बाजत
बाँसुरिया
अगम भुवन धुन
गुँजन मन मा,
सुमर घुमर बही
साँवरिया ।।
अगम मा
........................
जमुन गंग कस
पबरित लागत,
कमल फूलत मन
के तरिया ।।
अगम मा
.......................
अटल सोहाग सजत
चरचर ले,
चढ़त हे
सेन्दूर अउ चुरिया ।।
अगम
मा.........................
खुँदत डेहरी
शोभामोहन,
दमकत हे
मुँहरन करिया ।।
अगम मा..........................
शोभामोहन
२७/०७/२०२०
चारो भइया के
जावौं, बलिहार गुँइया ।
धन-धन होगे
भाग ह हमार गुँइया ।।
माथ मा
मटुकिया सोहत रगरग ले ।
मुचमुच हाँसी
मुँहरन जगजग ले ।।
आँखी नहीं थकत
निहार गुँइया ।
चारो भइया के
जावौं बलिहार गुँइया ।।......1
घुँघराली केश
हे बरत कस आँखी।
गोठ झरै मधु
सिरतोन गउ साखी।।
कुछु बूता झन
आँखी ला तियार गुँइया ।
चारो भइया के
जावौं बलिहार गुँइया ।।......2
मोती मनि जड़े
गर पहिरे हे माला ।
पँहुची मुँदरी
हीरा बरत निराला ।।
चारो कोती
होगे उजियार गुँइया ।
चारो भइया के
जावौ बलिहार गुँइया ।।......3
शोभामोहन जेकर
गावत हे जस ला ।
काटे बर मन
अँधियारी बरकस ला ।।
ओकर हे महिमा
अपार गुँइया ।
चारो भइया के
जावौं बलिहार गुँइया ।।......4
शोभामोहन
श्रीवास्तव
28/06/2019
सोंढ़ बेरला
बेमेतरा
झन भुलवार नही
मैं मानौ
छोटे-मोटे जिनिस बजरहा ।
चारे दिन चल इया
सरहा ।।
दे झन टार
नहीं मैं जानौ ।
झन भुलवार
नहीं मैं मानौ ....................
जगमाया किरचा
गड़गे हे ।
पुन बढ़गे हे
धुन चढ़गे हे ।।
गुन भर दिन अउ
रात बखानौ ।
झन भुलवार नही
मैं मानौ ।।..................
शोभामोहन पर
लागत जग ।
का परगोती का
असलग सग ।।
अब नइ अउ जर
मूल उखानौ ।
झन भुलवार
नहीं मैं मानौं .................
शोभामोहन
श्रीवास्तव
खुश्बूविहार
१५/०८/२०१९
#####################
जोत ले परिया
खेत
####################
जोत ले परिया
खेत रे हँसा,
जोत न परिया खेत ।
आवत-जावत साँस
सधै तब,
अमरित के घट
देत ।।
रे हँसा जोत
ले परिया खेत.............१/
बेर कटारी
जइसे होके,
देही टोंटा
रेत ।
रे हँसा जोत
ले परिया खेत .............२/
अंग जनावत हे
शुभ मंगल
बेरा देउत देत
।
रे हँसा जोत
ले परिया खेत.............३/
बन काँदी के
जर उपकाये,
थोरिक तो चेत
।
रे हँसा जोत
ले परिया खेत.............४/
दिन-दिन पाग
बतर के बुलकत,
चूँदी होवत
सेत ।
रे हँसा जोत
ले परिया खेत..............५/
का-का
जोरन-भारन हावय,
बकठउनी सब लेत
।
रे हँसा जोत
ले परिया खेत............६/
अब उराठ कहूँ
नइ होये,
परही जगती बेत
।
रे हँसा जोत
ले परिया खेत............७/
शोभामोहन
सँभल-सँभल चल,
जाये कोती नेत
।
रे हँसा जोत
ले परिया खेत.............८/
शोभामोहन
श्रीवास्तव
खुश्बूविहार
१९/०६/२०२०
अभी दिया मा
तेल बचे हे ।
असल नकल के
खेल बचे हे।।
भितिया भारा
ला भसका के,
अभी होय बर
मेल बचे हे ।
जेन नशा के नही
उतारा,
चढ़े उही जबरेल
बचे हे ।
सबले बजनी बाज
डरे हँव,
बाँधे मने
दंँतेल बचे हे ।।
बेरा डँगनी
अकन हवै अब
जग के नंँगते
झेल बचे हे ।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
३०/०५/२०२०
खुश्बू विहार
कालोनी
आशा धरे
निरासा बादर,
बरसत गरजत
घुमरत हे ।
सबो डहर ले
लात खाय मन,
हार खाय पिय सुमरत हे ।
अतंस आज तिहार
मनावत,
संग पिया के सँघरत
हे ।।
झूम लगत हे
गोठ सुनके,
जादू मंतर
सँचरत हे ।।
शोभामोहन
२४/०५/२०२०
*
मन की हालत
*
(१)
रे मन चंचल जा
गिंजरे झन,
चेत लगा अब
ईश्वर कोती ।
हे दुख ना सुख
ये जग मा सुन,
भाव बियापत जम्मो
जोती।
एक समान घटै
घटना सब,
फेर बनै दुख
या सुख सोती।
जेन दशा मन हा
जनवावय,
तेन ल जान सकै
यह होती।
(२)
साध नहीं
पुरही बुड़बे दुख,
साध पुरे सुख
मा बउराबे ।
साध सधाय
बँधाय रहे बर,
आगर आगर आस
लमाबे ।
जान दही कपसा
झन खा सुन,
फेर नहीं
मिलही पछताबे ।।
जेन हवै सबले
बड़का सुख,
वो सुख ला तब
तो सपड़ाबे ।
पार सबो सुख
के दुख के रहि,
अंतस देव परान
जगाबे ।
(३)
जे नत ला कहि
सुंदर रूपस,
मोह मया ममता
अगराबे ।
छूटत जीव मशान
चले बर,
प्रीत भुला
अबड़े लउहाबे ।
डार चिता
पँचलाकड़िया अउ,
पाँत धरे
नदिया म नहाबे ।
आ घर पालथिया
बइठे अउ,
पेट लगे अगनी
ल बुताबे।
शोभामोहन
१०/०५/२०२०
देह असत हे सत
हे अंतस
देह असत हे सत
हे अंतस ।
मन के डोरी
डाँवा बरकस ।।
जहर जगत मा
भीतर मधुरस।
देह असत हे सत हे
अंतस ।।
मांस मूत मल
गठरी चोला ।
महामोह जेकर
बर तोला ।।
दाँव लगाये
हावस सरबस ।
देह असत हे सत
हे अंतस ।।
काल गाल सबो
समाथे ।
चतुरा मूरख
सबो झपाथे ।।
कर अगवानी
बेरा हँस हँस ।
देह असत हे सत
हे अंतस ।।
डर मा साँप
जनावत डोरी ।
बाँचे ड उल
लगावत कोरी ।।
डर छूटे ले
खेल असन बस।
देह असत हे सत
हे अंतस ।।
धरा बँधा के
जब जग आथे ।
तब तब कतका
रोथे गाथे ।।
जात भुलाके अउ
जाथे रस ।।
देह असत हे सत
हे अंतस ।।
गिंजर घुमर
चौथापन आथे ।
जीब जगत के
खेल भुलाथे।।
लाग नता सब ला
भूले कस ।
देह असत हे सत
हे अंसत ।।
फिरही धर मानस
गुन आगी ।
गगन महल चरही
अनुरागी ।।
जब तक नइ होही
जस के तस ।
देह असत हे सत
हे अंतस ।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
०७/०५/२०२०
सब करगा ला
खनके आहूँ
सब करगा ला
खनके आहूँ ।
आहूँ बने हकन
के आहूँ ।।
बने सँभर बन
ठनके आहूँ ।
सब करगा ला खनके
आहूँ ।।
बन बदउर हे
जागे भारी ।
बेर चलत हे
चाल शिकारी।।
पार सबो अलहन
के आहूँ ।
सब करगा ला
खनके आहूँ ।।
हिरदे के आसन
सुन्ना मा ।
छुच्छा कुरिया
मन उन्ना मा ।।
तोला थापे
गुनके आहूँ ।।
सब करगा ला
खनके आहूँ ।।
रीता हे अमरित
के करसा ।
जहर अभरगे गिर
मुँड़भरसा।।
लालच तिसना
हनके आहूँ ।।
सब करगा ला
खनके आहूँ ।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
०४/०५/२०२०
सबो छोड़के
साँस-साँस मन, हरिगुन गाना रे
अउ कोनो मग
कहूँ बताथे, झन पतिया ना रे ।।
छोड़-छाँड़ के
सब हुसियारी ।
लाग-नता गोती
लगवारी ।।
खीख परे काया के
गढ़ ला, भज उजरा ना रे।
सबो छोड़के
साँस-साँस मन, हरिगुन गाना रे ।
चलत-फिरत जग
करत गुजारा।
प्रभु गुन
कीर्तन भजन अजारा ।।
साधन नर-तन
पाके सुमरत, भव तर जाना रे ।
सबो छोड़के
साँस-साँस मन, हरिगुन गाना रे ।
साँसा डोरी
नाम मोतिया।
भजत-भजत जल
जही जोतिया।।
चौरासी चक्कर
नहकत द्युत लोक समा ना रे ।
सबो छोड़के
साँस-साँस मन, हरिगुन गाना रे ।
कतको बड़का
राजा राठी।
सबो मिंझरथे
एक दिन माटी ।।
प्रभु ला साधे
अलग डार मा,पिकरी पकाना रे।
सबो छोड़के
साँस-साँस मन, हरिगुन गाना रे ।
शोभामोहन मगन
भजन हे।
लाग नता बस एक
सजन हे।।
भजन बिगन नइ
हे चोला के, कुछु ठिकाना रे।
सबो छोड़के
साँस-साँस मन, हरिगुन गा ना रे ।।
शोभामोहन
१६-०१/२०२०
राम भजन कर ले
रे मनवा
राम भजन कर ले
।।
सब करवाइन
हुकुम बिगारी।
कोनो नइ देइन
बनिहारी ।।
कुछु अरजन कर ले रे
मनवा राम भजन .......
दुख पीरा के
गीत बनाये ।
अउ भैरा जग
मेर चिचियाये ।।
दूसर मन कर ले
रे मनवा राम भजन........
एक परत अउ
दाँव लगा ले।
चुलुक मन हरि
छाँव लगा ले।।
चोला धन कर ले
रे मनवा राम भजन ...........
शोभामोहन
१६/०१/२०२०
अब ए तोला कोन बताय (सरसी)
उम्मर भर गौंतरिहा बनके,
अपने गाँव भुलाय । अब ए तोला
..........
भटके रहिते बाट पूछथे,
जान सून मिटकाय। अब ए
तोला..........
हाट बाट जा आँखी नाचत,
रिंगीचिंगी धरवाय। अब ए तोला
................
कठवाये मन-तन बेरा पुर,
लोहा घलो घुनाय। अब ए तोला..................
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शोभामोहन
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पिया रंगरसिया
बिन दिन न पहाँव
मोर पिया के
गाँव बसंती,
सब दिन अउ सब
ठाँव । पिया रंगरसिया
खोर खड़े आ
प्रियतम डोला,
छिन नइ बेर लगाँव
। पिया रंगरसिया
झलमल अँचरा
पहिरँव पिंवरी,
हँसत बदन घर
जाँव । पिया रंगरसिया
मोर पिया घर
चमचम चमकत,
सहस सुरुज के
गाँव। पिया रंगरसिया
मोर पिया के
गगन हवेली,
बिन पँवठा चढ़
जाँव। पिया रंगरसिया
मोर पिया हे
गजब मयारु,
रखय हँथेरी
छाँव । पिया रंगरसिया
मोर पिया जग
भर ले मंडल,
सबले बड़का साव
। पिया रंगरसिया
मोर पिया हे
सबले बड़हर,
माया के परपंच
काटके
अंतस ला
दमकइया कोन ।। दाँव । पिया रंगरसिया
शोभामोहन
८/कलकुत कर-कर गुन गा लौं
(राग बंजारा ताल)
कलकुत कर-कर गुन गा लौं।
पिया रंग रंग के लहरा लौं ।
सोन रजत पथरा मन मोहै ।
झन दृग कागद कुटका जोहै।।
होती ल अपन बिसरा लौं । कलकुत.......
जमो जिनिस मा रासा-बासा।
तोर भरोसा जीवधर साँसा।।
तन-मन अउ प्रान धँसा लौं ।
कलकुत....
सबो लोक तोरे पगरइती ।
चलै नइ अउ ककरो पइती।।
जग नार फाँस झटका लौं।
कलकुत........
शोभामोहन
१३/०१/२०२०
तोला छूवे के मन होथे
ठाढ़ कुछु जब अलहन होथे ।
मोर एक मन दू मन होथे ।
नेम धरम ला तीर मड़ाके ,
तोला छूवे के मन होथे ।
अब का कोनो तीरथ जावँ,
पाप धोवँव का जाके गंगा ।
अमृत जहर दूनो के धारा,
भीतर हावय मन सतरंगा।।
काबा भर कबिया के तोला,
पूरा मन के गिंजरन होथे ।।
नेम धरम तीर मड़ाके,
तोला छूवे के मन होथे ।।
शोभामोहन
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