जे गुनिया जन तीर बसे अउमाँगय दान सबो हितकारी ।
प्रश्न करै सब उत्तर पावय,जीवन लाभ बनै अधिकारी
पाय उहीच बताय सबो झन,जान बने बड़ होय सुखारी ।
हे मनखे उपदेसु गुरूजन,सिल्प सुजान बनाय सवारी ।
जे बिध रात बिहान करे ,व्यवहार वही बिध हो मनुसाना ।
ओर धरे करि जेवन आवन,जावन के व्यवहार सुजाना।
देंह ल राख बने शुभ में सुख ,पावन हेत सदा सुख नाना ।
बेद बतात सबो झन के हित,जीव रखे बर जान खजाना ।
शोभामोहन श्रीवास्तव
बूँद बचाय उदीम हजारी
1/
जान तहूँ जनवा अउ लोगन, हे धरनी जल सोत करारी ।
बूँद बना न सकै बिगियानिक, ईश रचे जल जान अनारी ।।
फोकटिहा उरका न रितो अब,बात बिगाड़न खातिर भारी ।
देख अँटावत भूजल सोंचन, बूँद बचाय उदीम हजारी ।।
2/
सोच बिना जल के जग जीवन,प्रान बचावन कोन अधारी ।
पेड़ बिना फर फूल लता बन,औसध अन्न बिना सुखकारी ।।
ताल तलाब सरोवर के बिन,सिन्धु बिना सुख के उजियारी ।
देख अँटावत भूजल सोंचन, बूँद बचाय उदीम हजारी ।।
शब्दार्थ
करारी-सीमित, अनारी-मूर्ख,फोकटिहा-व्यर्थ
रितो-उड़ेलना या उलीचना गिराना बहाना, उरका-समाप्त,अँटावत-जलस्तर कम होना,
उदीम-उद्यम,
शोभामोहन श्रीवास्तव
१८/०३/२०२०
सवैया
1/
जान तहूँ जनवा अउ लोगन, हे धरनी जल सोत करारी ।
बूँद बना न सकै बिगियानिक, ईश रचे जल जान अनारी ।।
फोकटिहा उरका न रितो अब,बात बिगाड़न खातिर भारी ।
देख अँटावत भूजल सोंचन, बूँद बचाय उदीम हजारी ।।
2/
सोच बिना जल के जग जीवन,प्रान बचावन कोन अधारी ।
पेड़ बिना फर फूल लता बन,औसध अन्न बिना सुखकारी ।।
ताल तलाब सरोवर के बिन,सिन्धु बिना सुख के उजियारी ।
देख अँटावत भूजल सोंचन, बूँद बचाय उदीम हजारी ।।
शब्दार्थ
करारी-सीमित, अनारी-मूर्ख,फोकटिहा-व्यर्थ
रितो-उड़ेलना या उलीचना गिराना बहाना, उरका-समाप्त,अँटावत-जलस्तर कम होना,
उदीम-उद्यम,
शोभामोहन श्रीवास्तव
१८/०३/२०२०
सवैया
सब बेद बखान करै उँकरे,सब शास्त्र उही ल सिधोवत हे ।
सद्ग्रन्थ उही ल अधार बना,मनके करियापन धोवत हे ।
धर अंतस मा गुन गोठ धरे,गँठियाय उही चक होवत हे ।
अड़हा मनखे अनजान बने,अँधियार परे अउ रोवत हे ।
देह बनै बड़ जोर लड़ैया (मत्तगयन्द छंद)
~~~~~~~~~~~~~~~~
आफत आवत देख भिंड़े बर,देह बनै बड़ जोर लड़ैया ।
हे मन हा सकवान बड़ा सुन,रीझ बुझे व बिरोध करैया ।
अंतस हे सबले जबरा अउ,दूर हँकारन रोग बलैया ।
प्रकृति दे सबला सक साधन,रूँध अजार मुसेट मरैया ।।
फेर कभू कुछु कारन मारन,ले बिगड़े सुमता तन तारी ।
बात बिगाड़ बियावय रोग ल,हो तन में झगरा बड़ भारी ।
ओरझथे तन शक्ति भगाय ल,देह रसे तब रोग अजारी ।
सैनिक हे रखवार हवै तन,माँझ भँजावव होव सुखारी ।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
शोभामोहन श्रीवास्तव
०१/०४/२०२०
~~~~~~~~~~~~~~~~
आफत आवत देख भिंड़े बर,देह बनै बड़ जोर लड़ैया ।
हे मन हा सकवान बड़ा सुन,रीझ बुझे व बिरोध करैया ।
अंतस हे सबले जबरा अउ,दूर हँकारन रोग बलैया ।
प्रकृति दे सबला सक साधन,रूँध अजार मुसेट मरैया ।।
फेर कभू कुछु कारन मारन,ले बिगड़े सुमता तन तारी ।
बात बिगाड़ बियावय रोग ल,हो तन में झगरा बड़ भारी ।
ओरझथे तन शक्ति भगाय ल,देह रसे तब रोग अजारी ।
सैनिक हे रखवार हवै तन,माँझ भँजावव होव सुखारी ।।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
शोभामोहन श्रीवास्तव
०१/०४/२०२०
भीतर ही रहियो बन राजा (मत्तगयंद सवैया)
सून भईं गलियांँ सड़कें अरु,बंद सभी खिड़की दरवाजा।
माल दुकान कपाट खुलै नहि, मंदिर में नहि बाजत बाजा।।
दंड मिले जब बाहिर जावहु,छोट बड़े अटके कछु काजा।
रेख खचाय दियो सरकारहि,भीतर ही रहिये बन राजा।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
सून भईं गलियांँ सड़कें अरु,बंद सभी खिड़की दरवाजा।
माल दुकान कपाट खुलै नहि, मंदिर में नहि बाजत बाजा।।
दंड मिले जब बाहिर जावहु,छोट बड़े अटके कछु काजा।
रेख खचाय दियो सरकारहि,भीतर ही रहिये बन राजा।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
मत्तगयंद छंद (वेदमंत्र )
जे बिध रात बिहान करे,व्यवहार वही बिध हो मनुसाना ।
ओर धरे करि आवन जावन,जेवन के व्यवहार सुजाना।
देंह ल राख बने शुभ में सुख,पावन हेत सदा सुख नाना ।
बेद बतात सबो झन के हित, जीव रखे सुख ज्ञान खजाना ।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
जे बिध रात बिहान करे,व्यवहार वही बिध हो मनुसाना ।
ओर धरे करि आवन जावन,जेवन के व्यवहार सुजाना।
देंह ल राख बने शुभ में सुख,पावन हेत सदा सुख नाना ।
बेद बतात सबो झन के हित, जीव रखे सुख ज्ञान खजाना ।
शोभामोहन श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
मत्तगयंद छंद
जे गुनिया जन तीर बसे अउ माँगय ज्ञान सबो हितकारी ।
प्रश्न करै अउ उत्तर पावय, जीवन लाभ बनै अधिकारी
पाय उहीच बताय सबो झन, जान बने बड़ होय सुखारी ।
हे मनखे उपदेसु गुरूजन, सिल्प सुजान बनाव सवारी ।
जे गुनिया जन तीर बसे अउ माँगय ज्ञान सबो हितकारी ।
प्रश्न करै अउ उत्तर पावय, जीवन लाभ बनै अधिकारी
पाय उहीच बताय सबो झन, जान बने बड़ होय सुखारी ।
हे मनखे उपदेसु गुरूजन, सिल्प सुजान बनाव सवारी ।
९/सदग्रंथ गुन बखान सवैया
सब बेद बखान करै उँकरे,
सब शास्त्र उही ल सिधोवत हे ।
सद्ग्रन्थ उहीच अधार बना,
मनके करियापन धोवत हे ।
धर अंतस मा गुन गोठ सबो,
गँठियात उही चक होवत हे ।
अड़हा मनखे अनजान बने,
अँधियार परे अउ रोवत हे ।
शोभामोहन
१०/प्रभु के विराटता सवैया
जतका जग ला परसे नयना,
भरतार लुकाय हवै सबमे ।
नइ जानन कारज हेत उँहो,
करतार समाय हवै सबमे ।
जग कारज गुन सुभाव सबो,
गुनधार अमाय हवै सबमे ।
सब रंग बसे सब रूप हँसे,
अउ सार जगाय हवै सबमे ।
शोभामोहन
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सब बेद बखान करै उँकरे,
सब शास्त्र उही ल सिधोवत हे ।
सद्ग्रन्थ उहीच अधार बना,
मनके करियापन धोवत हे ।
धर अंतस मा गुन गोठ सबो,
गँठियात उही चक होवत हे ।
अड़हा मनखे अनजान बने,
अँधियार परे अउ रोवत हे ।
शोभामोहन
१०/प्रभु के विराटता सवैया
जतका जग ला परसे नयना,
भरतार लुकाय हवै सबमे ।
नइ जानन कारज हेत उँहो,
करतार समाय हवै सबमे ।
जग कारज गुन सुभाव सबो,
गुनधार अमाय हवै सबमे ।
सब रंग बसे सब रूप हँसे,
अउ सार जगाय हवै सबमे ।
शोभामोहन
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