ऊर्जा के उपयोग
ऊर्जा के उपयोग, करे बर सब झन जानो।
सबमें हवय समाय,तेन ऊर्जा पहिचानो।।
आगी पानी सूर्य,पवन में ऊर्जा हावय।
जानय जे उपयोग,उही हर जान जनावय।।
ऊर्जा बउरे जानथे,ते सब बर सुख लानथे।।
ओकर गुन पहिचान ले,अउ बउरे बर ठान ले।।
शोभामोहन
[01/07/19
जगत रचे करतार
हा (छप्पय)
जगत रचे करतार,तत्व ला
पाँचों जोरे ।
जीव ह सबो
बँधाय,सकय नइ बँधना छोरे।।।
कारज जतका होय,कसै बाँधय बड़ भारी।।
हरिभज गति
सुधार,कहत प्रभु बन संगवारी।।
गीता पढ़के जान ले,कइसे जीना तेन
ला।
कृष्ण बताये
पार्थ ला,कुरुक्षेत्र मा जेन ला।।
शोभामोहन
झिल्ली जहर समान
खा पी सबो सुजान,अभी तो झिल्ली फेंके।
हे उछींद के राज,इहाँ कोनो नइ छेंके।।
अलहन होही ठाढ़, तेन दिन देखे जाही।
करहीं ओमन उहिच,जेन हर मन ला भाही।।
भुँइया बंजर होन दौ, रोवय तेला रोन दौ ।
सुते तेन ला जान दौ,जागे ला चिचियान दौ।।
बेचइया के दोस,कभू नइ झोला माँगय ।
लेवइया के दोस,खाँध ओला नइ टाँगय।।
अंँधरा हे सरकार,देख नइ रोक लगावय।
भैरा हवय समाज,जगइया कतिक जगावय।।
लेवत तेला लेन दव,देवत तेला देन दव ।
फोकटिहा समझाव झन,अक्कल अपन लुटाव झन।।
झिल्ली जहर समान,हवय ए जान जनाबे।
झोला रख सामान,नहीं घर झिल्ली लाबे।।
झिल्ली बरके जान,घोरथे जहर बयारी ।
चारो खुंट झन फेंक,समझ जा अब संगवारी।।
अपन जान समझात हँव,सावचेत करवात हँव।
माने बर हे मान ले,नहीं तो खतरा जान ले ।।
शोभामोहन
28/06/19
सास बहू बिसराय सबो झगरा ला घर के
सास बहू बिसराय,सबो झगरा अब घर के।
अपने मा बइहाय,हवँय मोबाइल धरके।।
सास न रँधनी जाय,कभू अब झाँके ताके।
चारी करे भुलाय,हवय एन्ड्राइड पाके।।
मगन बाप बेटा हवँय,डाटा खँगन न देत हे।
बने फेसबुक फ्रेन्ड अब,दूनो लाहो लेत हे।।
शोभामोहन
[24/06, 19:22]
पानी के महत्तम
पानी हे अनमोल,समझना अउ बतलाना।
बूँद बूँद के मोल,समझ के बउरत जाना।।
अपन भरोसा भार, जगत ला उही जियाथे ।
पेड़ फूल अउ जीव,अपन रसधार पियाथे।।
पीके अमृत धार ला, दिखथे सबो खिले खिले।
फोकट के बोहाव झन,जब सिद्धो पानी मिले।।
मनखे पानीदार,सबो ला गजब सुहावय।
पानी मरे जनाय,कहूँ ओला नइ भावय।।
पानी पानी होय,लजाके कोई कोई।
पानी के गुनगान,करे आखर कम गोई।।
पानी पी पी के कहूँ,हाथ लमाय बखानथे।
कोनो पानी काकरो,अउ उतार के मानथे ।।
पानी के का मोल,बताथे मछरी ओला।
पानी बाहिर होत,तड़फ तज देथे चोला।।
प्यास बताथे मोल,काय पानी के हावय ।
कतको दिन बिन खाय,भले मनखे रहि जावय।
दू दिन मा पानी बिगन,सबके सब अइला जथे।
कतको सुंदर रूप हो,पानी बिन मइला जथे।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
[27/06, 15:07]
धरती मरत पियास
करिया बादर छाय हे,जागत हावय आस।
बाट निहारत रातदिन,धरती मरत पियास।।
धरती मरत पियास,मया के भेजे पतिया।
पवन फिरन्ता ताय,भूलगे का बहमतिया।।
आस लगाये बाट,निहारत दसा अँचरिया।
कोन हवय बिलमाय,आय नइ बादर करिया।।
शोभामोहन
[21/06, 09:48]
जगत रचे करतार हा (छप्पय)
जगत रचे करतार,तत्व ला पाँचों जोरे ।
जीव ह सबो बँधाय,सकय नइ बँधना छोरे।।।
कारज जतका होय,कसै बाँधय बड़ भारी।।
हरिभज गति सुधार,कहत प्रभु बन संगवारी।।
गीता पढ़के जान ले,कइसे जीना तेन ला।
कृष्ण बताये पार्थ ला,कुरुक्षेत्र मा जेन ला।।
शोभामोहन
पानी के
महत्तम
पानी हे अनमोल,समझना अउ
बतलाना।
बूँद बूँद के
मोल,समझ के बउरत जाना।।
अपन भरोसा भार, जगत ला उही जियाथे
।
पेड़ फूल अउ जीव,अपन रसधार
पियाथे।।
पीके अमृत धार
ला, दिखथे सबो खिले खिले।
फोकट के बोहाव
झन,जब सिद्धो पानी मिले।।
मनखे पानीदार,सबो ला गजब
सुहावय।
पानी मरे जनाय,कहूँ ओला नइ
भावय।।
पानी पानी होय,लजाके कोई
कोई।
पानी के
गुनगान,करे आखर कम गोई।।
पानी पी पी के
कहूँ,हाथ लमाय बखानथे।
कोनो पानी
काकरो,अउ उतार के मानथे ।।
पानी के का
मोल,बताथे मछरी ओला।
पानी बाहिर
होत,तड़फ तज देथे चोला।।
प्यास बताथे
मोल,काय पानी के हावय ।
कतको दिन बिन
खाय,भले मनखे रहि जावय।
दू दिन मा
पानी बिगन,सबके सब अइला जथे।
कतको सुंदर
रूप हो,पानी बिन मइला जथे।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
[27/06, 15:07]
झिल्ली जहर
समान
खा पी सबो
सुजान,अभी तो झिल्ली फेंके।
हे उछींद के
राज,इहाँ कोनो नइ छेंके।।
अलहन होही ठाढ़, तेन दिन देखे
जाही।
करहीं ओमन उहिच,जेन हर मन ला
भाही।।
भुँइया बंजर
होन दौ, रोवय तेला रोन दौ ।
सुते तेन ला
जान दौ,जागे ला चिचियान दौ।।
बेचइया के दोस,कभू नइ झोला
माँगय ।
लेवइया के दोस,खाँध ओला नइ
टाँगय।।
अंँधरा हे
सरकार,देख नइ रोक लगावय।
भैरा हवय समाज,जगइया कतिक
जगावय।।
लेवत तेला लेन
दव,देवत तेला देन दव ।
फोकटिहा समझाव
झन,अक्कल अपन लुटाव झन।।
झिल्ली जहर
समान,हवय ए जान जनाबे।
झोला रख सामान,नहीं घर
झिल्ली लाबे।।
झिल्ली बरके
जान,घोरथे जहर बयारी ।
चारो खुंट झन
फेंक,समझ जा अब संगवारी।।
अपन जान समझात
हँव,सावचेत करवात हँव।
माने बर हे
मान ले,नहीं तो खतरा जान ले ।।
शोभामोहन
28/06/19
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