चुपर भभूती साँप लपेटे, ध्यान मगन हो
सुख पाथे ।।
भोला भोला बोलत रहिबे, अउ प्रलयंकर हो
जाथे।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
[10/09/19 ]
मदनबान ला काट दिही जे, ओहर शंकर हो
जाही ।
मरी असन ओकर बर ये जग, हीरा कंकर हो
जाही।।
बिरहा हर
एहँवाती हे
######################
गजब बजावत
चूरी पैजन ,बिरहा हर एहँवाती हे ।
आँखी सपना सबो
समोखत, अउ नइ कुछु सुहाती हे।।
आखर के उजियार
बताथे, तोर लिखे सब पाती हे ।
उथस बुड़थस
अंतस तैं जस, सुकुवा उवै पहाती हे ।।
######################
शोभामोहन
२७/०१/२०२०
बाग बगइचा लठरत
झुमरत,
झरे पान
अइलाये हे ।
पेड़ बसंती नवा
देंह बर,
जुन्ना नता
भुलाये हे।
पिंयर पिंयर
सब पाना गिरगे,
चुप्पे धनहा
डोली हे ।
घाम घरी
सुस्तइया के मुँह,
दू टप्पा नइ
बोली हे ।।
मेड़-पार सब
हवँय कलेचुप,
देख गति ला
पाना के ।
कोनो नइ हे
संगी जग में,
होये ताना-नाना
के ।।
शोभामोहन
हमर जमाना
1/
कोठी डोली ढाबा खोली , नइ हे नवा जमाना मा ।
मन मा मधुरस कस घुर जाथे, जम्मो बात पुराना मा।।
2/
बडे फजर ले उठके जावन, डूमर कसही ला
बीने।
छड़ी बंबरी पातर -पातर, दूबट्टा जावन छीने।।
3/
संँगी धरे खार मा जावन,चोराये बर ओन्हारी।
पल्ला भागन जीव बचावये , खावन बड़ गल्ला गारी ।।
4/
बिल्लस पाली खुडुवा खेलन, अउ खेलन तीरी-पासा ।
सरी मँझनिया अमरइया मा, होवय कुहुक घरी बासा
।।
5/
हारे दाम ल जीते अब्बड़, चाल चलन आनी-बानी।
साँझ होत अँचरा नइ छोड़न, महतारी आजी नानी।।
6/
मिरचा धनिया अउ पताल ला, टोरन जा कोला-बारी।
बाग बगइचा मा अभरे हन, नाग देव डोमी कारी।।
7/
चिखला माँते अँगना रेंगन, गोड़ गड़ो खोभे- खोभे ।
बिजहा-भतहा काँड़ी धरके, सीखन माँदा मा टोभे ।।
8/
भरुहा काँड़ी सीजर पीयन, चना मूँग खावन होरा ।
अक्ती पुतरी पुतरा फोदो, घरघुँदिया चुकिया पोरा ।।
9/
गउ बिद्या अउ रतिहा माई, सब्बै झन किरिया खावै।
पानी बरसे ते दिन कोनो, स्कूल पढ़े बर नइ जावै।।
10/
कतको दिन बिजली नइ आवय,बारन तब चिमनी टेमा ।
बिगन पदोये खावन पीयन, जेने मिल जावै तेमा।।
11/
घर भर सब खाये बर बइठन, एक संग जुर ओसारी।
महतारी के साग पान खा , आवय मजा अबड़ भारी।।
12/
घर बागड़ पंचइती होवय, सबो बात सुलटा
डारें ।
जेन उदेलय तेला दाँड़यँ, मनखे ला उलटा डारें ।।
13/
कुँआ पार मा पनिहारिन के, चूरी अउ साँटी बोले।
तरिया नदियाँ सखी नहावत, अंतस बंधना ल खोले।।
14/
दूध दही ले मूँह जुठारन, अउ खावन घी के लोंदी ।
अतका खाजी भरे रहय मूँह ,ऊँ ऊँ बोलन जस कोंदी।।
15/
डीह ड़ोगरी पूजा होवय, जावन सब झन जोहारे ।
गीत भोजली जोत जँवारा,गावँन सब नान्हे बारे।।
16/
बोइर पेंड़ परेतीन रहिथे, डरवावै बुड़ही दाई।
घर के बने कलेवा खावन, खरचन नइ एक्को पाई ।।
17/
गरती आमा के चक्कर मा, पेंड़ फोंक फलगे जावै।
ड़ंडा पचरंगा खेले बर, अब्बड़ सब्बो ला भावै ।।
शोभामोहन
(07/09/19/16:59)
शोभामोहन
ओहर शंकर हो जाथे
ताटंक
1/
मदनबान के काट
खोजथे, ओहर शंकर हो जाथे ।
मरी असन ओकर बर जग
अउ, हीरा कंकर हो जाथे।।
2/
चुपर भभूती साँप
लपेटे, रूप भयंकर हो जाथे ।।
भोला भोला बोलत
रहिबे, अउ प्रलयंकर हो जाथे।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
[10/09/19 19:08]
बार आसरा के दियना ला ताटंक
1/
बार आसरा के दियना तँय, आँसू ला ढरका डारे ।
काल-ताल मा नाचत-कूदत,उम्मर ला खरका डारे।।
2/
घूँघरु बजा छनन-छन-छन-छन,हाँसी में टरका डारे ।
सबो भोरहा ला ढ़ाके बर,ओलवार सरका डारे।।
3/
चिहुर म झनकत अंतस अँगना, धड़कन ला सुन लेबे रे।
बेर बुड़े पहिली का करना,हावय ए गुन लेबे रे।।
शोभामोहन
[10/09/1920:11]
बार आसरा के
दियना ला( ताटंक)
1/
बार आसरा के
दियना तँय,
आँसू ला ढरका
डारे ।
काल-ताल मा
नाचत-कूदत,
उम्मर ला खरका
डारे।।
2/
घूँघरु बजा
छनन-छन-छन-छन,
हाँसी में
टरका डारे ।
सबो भोरहा ला
ढ़ाके बर,
ओलवार सरका
डारे।।
3/
चिहुर म झनकत
अंतस अँगना,
धड़कन ला सुन
लेबे रे।
बेर बुड़े
पहिली का करना,
हावय ए गुन
लेबे रे।।
शोभामोहन
[10/09/1920:11]
शीर्षक -सिरतो
इही खजाना हे ताटंक
1/
खोल अपन भंडार दुआरी, बइहा बादर होगे हे।
पनखत्ती अउ भाँठा परती, जम्मो झन सुख भोगे हे।।
2/
भुँइया ला भरपूर सँवारे, करिया बादर होगे हे।।
होवत हे चर्चा चढ़ाव के, सात भाँवर होगे हे।।
3/
लचलच-लचलच
लचकत हावय, भुँइया दुलही के झाँपी ।
करा पठउनी घोड़ा बइठत,बर लहुटत लहरा साँफी।।
4/
रेंगत हे मरजाद भुलाये, मटमटही नदिया रानी।
लहरा इतरौना मा होवत, घाट करेजा हर चानी ।।
5/
प्यास बुतावत पार ललाये, नइ समात लहरा फूले।।
सबके आस पुरोवत बादर, भुँइया भर गिंजरे बूले ।।
शोभामोहन
[11/09, 12:50]
नही रंगरेली भाही ताटंक
1/
अपन बनाये रंगमहल के, नहीं रंगरेली भाही।
फड़फड़ात फुरफुन्दी दिखते, जमराजा दँऊड़त आही।।
2/
झोल रपोटे धरे चिपोटे, चीज बोह नइ जाना हे ।
नाम सार हे जोरे-भारे, सिरतो इही खजाना हे।।
3/
तिल तिल जोरे तोर चीज मा,दूसर नाम चढ़ा जाहीं ।
फड़फड़ात फुरफुन्दी दिखते, जमराजा दँउड़त आही।।
4/
मन के बात सुने नइ तेला, दुख जंजाल झपाना हे।
घेरीबेरी गिंजरन परके,दुख अल्हन अमराना हे।
5/
बेरा होही सुआ उड़ाही, जिनगी बिरथा हो जाही।
फड़फड़ात फुरफुन्दी दिखते, जमराजा दँउड़त आही।।
शोभामोहन
12/09/2019
रेती मा लिख नाम लहरिया ताटंक
1/
रेती मा लिख नाम लहरिया,जल मा डाँड़ी पारे हे ।
लरा-जरा सब लाग-नता ला,आगर आस निहारे हे ।।
2/
आनीबानी जंतर-मंतर,जादू-टोना भारी हे ।
तन गुमान इरखा मा बूड़े,जगत लगत मनहारी हे ।।
3/
अँगरी धरके जेन चलाइस,ओकर गुन नइ माने हे ।
डेना पाँखी जागिस तब ले,अपन सियानी ताने हे ।।
4/
धरत सकेलत जानो-मानो,अम्मर खाके आये हे ।
सात जनम नौ जुग बर जइसे,भुँइया नाम चढ़ाये हे।।
5/
उड़त हवय चिरइया जइसे,थक के कहाँ थिराही ते ।
चारो खाना चित हो जाही,बेरा भुँइया लाही ते ।
शोभामोहन
कस्तूरी खोजत आँखी ताटंक
1/
मन मिरगा ला छोड़त ढ़िल्ला, कस्तूरी खोजत आँखी ।
अपन ठगत हावय अपने ला, पर ले माँग सुआ पाँखी ।।
2/
लहरा के पैजन पहिरे हे,माँझ धार नदिया जाके।
गोड़ देखावत हवय बही कस,पार खड़े मन ला आके ।।
3/
छूटत नइ हे खेल तमाशा, टकर परे हावय जुन्ना ।
नकल-चकल
रँगरेली भावत, अंतस कोती हे
सुन्ना ।।
शोभामोहन
कस्तूरी खोजत
आँखी ताटंक
मन मिरगा ला
छोड़ के ढ़िल्ला,
कस्तूरी खोजे
आँखी ।
अपन ठगत हावय
अपने ला,
अउ खोजत सुख के
साखी ।।
लहरा पैजन
पहिरे हावय,
माँझ धार
नदिया जाके।
गोड़ देखावत
हवय बही कस ,
पार खड़े मन ला
आके ।।
अपन ठगत हावय
अपने ला,
अउ खोजत सुख
के साखी ।।
छूटत नइ हे
खेल तमाशा,
हावय टकर परे
जुन्ना ।
बाहिर के नकली
रँगरेली,
अंतस कोती हे
सुन्ना ।।
अपन ठगत हावय
अपने ला,
अउ खोजत सुख
के साखी ।।
शोभामोहन
12/09/19
का करहूँ सुख ला ले के ताटंक
उम्मर मोर सिरावत हावय, का करहूँ सुख ला ले के ।
थोरिक राम भजन ला करथँव, आँखी के परदा छेंके।।
अंतस झनकत रूप नाम ले, बाहिर झाँझ मंजीरा ले।
तन सोला सिंगार सजत हे, भीतर गुरतुर पीरा ले ।।
गरज छोड़ दे हँव दुनिया के, अब अधार मिलगे टेके ।
थोरिक राम भजन ला करथँव, आँखी के परदा छेंके।।
देंह दमक के लाख पुजेरी, अंतस फेर कुँवारी हे।
मतलब के सब लाग नता हे, अलकरहा फुलवारी हे ।।
आवत हँव सब लाग सुरर के, जीते जी हंँड़िया फेंके ।।
थोरिक तोर भजन ला करथँव, आँखी के परदा छेंके।।
शोभामोहन
कलकल कलकल कलकलात हे ताटंक
1/
कलकल-कलकल कलकलात हे,कालरूप कंकाली हा ।
रखमख-रखमख रेंगत हावय,रूप बिकट बिकराली हा ।।
2/
खरखर-खरखर रक्सा तीरत,भंडारे बर आये हे।
मूठा भर चुंदी ला धरके,आँखी ला छटकाये हे।।
3/
लपलप-लपलप जीभ निकाले,भड़के भँव ल चढ़ाये हे।
बेनी छोरे छरियाये हे,मुंडमाल गर नाये हे ।
4/
भदभद-भदभद दँउड़त जावत,चंडमुंड बर धाये हे ।
कटकट-कटकट करत दाँत ला,मूँड़ी काट मड़ाये हे ।।
5/
थरथर-थरथर देवता काँपत,शंकर तक थर्राये हे ।
ककरो ले नइ मानत काली,बरकस बन तनियाये हे ।
6/
रीस देख काली के भोला,आड़ करे बर आये हे।
शिव छाती जब गोड़ परिस हे, तब जा रीस जुड़ाये हे ।।
शोभामोहन
●पारब्रम्ह के दरसन ताटंक●
सोन झूलना
मखमल दसना, सुता सुनावत हे लोरी।
मया बँधाये
महतारी हर, झूला के तीरत डोरी।।
जइसे लेवइ
बछरू कोती, रँभावत गइया जाथे।
तइसे कृष्ण ल
जसुदा मइया, छिन भर बर नइ अलगाथे।।
जनमे जबले नाथ
त्रिलोकी, दरसन लालच मन छाये।
ब्रजभुँइया
भोला भंडारी , भेस भिखारी धर आये।।
हरि दरसन बर रेंधत भोले, खड़े दुआरी
नंदरानी ।
भोलेनाथ मनावत
कतको, अँडियाये बरजत खानी।।
दान दिये हँव
तेला धरके, रस्ता नाप अपन जा तो।
नींद परे हावय
लइका के, तँय झन जादा चिल्ला तो।।
जाननहार अगम
के कान्हा, गोड़ पटक रोवन लागे।
दँऊड़त हँफरत
महतारी हर,पाय दुवारी मा आगे।।
पारब्रम्ह के
दरसन पाके, होगे हे गदगद भोला।
सुमिरत हरि के
नाम निकलगे, कोनो न चिन्ह सकिस ओला।।
शोभामोहन
●बरसाना ले निकलत राधा (ताटंक ) ●
बरसाना ले
निकलत राधा, सुन बंशी धुन बैरागी।
सब झन
धूँकत-फूँकत हावँय, मन मा देख लगे आगी।।
मयानगर जा अपन
गोड़ मा, पिय के हाथ धरे आगे।
मधुबन कोती
गिंजरत-गिंजरत, दिन बुड़ती बेरा भागे ।।
संग जहुँरिया
मन चंचल हे, आज तिहार सहीं लागे।
भाव बहत हे
निछमल-छलछल, पाग मया दूनो पागे ।।
पथरा जइसे
निठुर जगत मा, मोम सजन सपड़ाये हे ।
गोकुल गाँव
कदंब तरी मा, प्रान रंँगे बर आये हे ।।
जमुनाजल मा
गोड़ डार के, हाथ धरे बइठे हावैं ।
सजन मनात
रिसाये सजनी, चुप्पे चुप अँइठे हावैं ।।
रधिया खोपा
खोंच फूल ला, बान चलावत नैना के ।
आँखी ले सब
काम चलत हे, बूता नइ हे बैना के ।।
शोभामोहन
●चारो खाना चित हो जाही(ताटंक )●
रेती मा लिख
नाम लहरिया,जल मा डाँड़ी पारे हे।
लरा-जरा सब
लाग-नता ला,आगर आस निहारे हे।।
आनीबानी
जंतर-मंतर, जादू-टोना भारी हे ।
तन गुमान इरखा
मा बूड़े, जगत लगत मनहारी हे।।
अँगरी धर के
जेन चलाइस,ओकर गुन नइ माने हे।
डेना पाँखी
जागिस तब ले,अपन सियानी ताने हे।।
धरत सकेलत
जानो-मानो, अम्मर खाके आये हे ।
सात जनम नौ जुग
बर जइसे,भुँइया नाम चढ़ाये हे।।
उड़त हवय
चिरइया जइसे,थक के कहाँ थिराही ते।
चारो खाना चित
हो जाही,बेरा भुँइया लाही ते ।
शोभामोहन
●छूटत नइ हे खेल तमाशा(ताटंक)●
मन मिरगा ला
छोड़य ढ़िल्ला,कस्तूरी खोजे आँखी ।
अपन ठगत हावय
अपने ला, पर ले माँग सुआ पाँखी ।।
लहरा पैजन
पहिरे हावय, माँझ धार नदिया जाके।
गोड़ देखावत
हवय बही कस, पार खड़े मन ला आके ।।
छूटत नइ हे
खेल तमाशा, हावय टकर परे जुन्ना ।
बाहिर के नकली
रँगरेली, अंतस कोती हे सुन्ना ।।
शोभामोहन
●महाकली सुमरनी(ताटंक)●
कलकल-कलकल
कलकलात हे, कालरूप कंकाली हा ।
रखमख-रखमख रेंगत
हावय,रूप बिकट बिकराली हा ।।
खरखर-खरखर
रक्सा तीरत, भंडारे बर आये हे।
मूठा भर चुंदी
ला धरके, आँखी ला छटकाये हे।।
लपलप-लपलप जीभ
निकाले,भड़के भँऊ चढ़ाये हे।
बेनी छोरे
छरियाये हे, मुंडमाल गर नाये हे ।
भदभद-भदभद
दँउड़त जावत,चंडमुंड बर धाये हे।
कटकट-कटकट करत
दाँत ला, मूँड़ी काट मड़ाये हे।।
थरथर-थरथर
देवता काँपत, शंकर तक थर्राये हे ।
ककरो ले नइ
मानत काली, बरकस बन तनियाये हे ।
रीस देख काली
के भोला, आड़ करे बर आये हे।
शिव छाती जब
गोड़ परिस हे, तब जा रीस जुड़ाये हे।।
शोभामोहन
●का करहूँ सुख ला ले के (ताटंक)●
उम्मर मोर
सिरावत हावय, का करहूँ सुख ला ले के।
थोरिक तोर भजन
ला करथँव, आँखी के परदा छेंके।।
अंतस झनकत नाम
ल लेके, बाहिर झाँझ मंँजीरा ले।
तन सोला
सिंगार सजत हे,भीतर गुरतुर पीरा ले।।
गरज छोड़ दे
हँव दुनिया के,तँय अधार हस मन टेके।
थोरिक तोर भजन
ला करथँव,आँखी के परदा छेंके।।
देंह दमक के
खड़े पुजेरी, अंतस फेर कुँवारी हे।
मतलब के सब
लाग नता हे,अलकरहा फुलवारी हे।।
आवत हँव सब
नता सुरर के,जीते जी हंँड़िया फेंके।
थोरिक तोर भजन
ला करथँव,आँखी के परदा छेंके।।
शोभामोहन
का करहूँ सुख ला ले के ताटंक
उम्मर मोर सिरावत हावय,
का करहूँ सुख ला ले के ।
थोरिक राम भजन ला करथँव,
आँखी के परदा छेंके।।
अंतस झनकत रूप नाम ले,
बाहिर झाँझ मंजीरा ले।
तन सोला सिंगार सजत हे,
भीतर गुरतुर पीरा ले ।।
गरज छोड़ दे हँव दुनिया के,
अब अधार मिलगे टेके ।
थोरिक राम भजन ला करथँव,
आँखी के परदा छेंके।।
देंह दमक के लाख पुजेरी,
अंतस फेर कुँवारी हे।
मतलब के सब लाग नता हे,
अलकरहा फुलवारी हे ।।
आवत हँव सब लाग सुरर के,
जीते जी हंँड़िया फेंके ।।
थोरिक तोर भजन ला करथँव,
आँखी के परदा छेंके।।
शोभामोहन
का करहूँ सुख ला ले के ताटंक
उम्मर मोर सिरावत हावय,
का करहूँ सुख ला ले के ।
थोरिक तोर भजन ला करथँव,
आँखी के परदा छेंके।।
अंतस झनकत नाम ल लेके,
बाहिर झाँझ मंँजीरा ले।
तन सोला सिंगार सजत हे,
भीतर गुरतुर पीरा ले ।।
गरज छोड़ दे हँव दुनिया के,
तँय अधार हस मन टेके ।
थोरिक तोर भजन ला करथँव,
आँखी के परदा छेंके।।
देंह दमक के खड़े पुजेरी,
अंतस फेर कुँवारी हे।
मतलब के सब लाग नता हे,
अलकरहा फुलवारी हे ।।
आवत हँव सब नता सुरर के,
जीते जी हंँड़िया फेंके ।।
थोरिक तोर भजन ला करथँव,
आँखी के परदा छेंके।।
शोभामोहन
बान अनंग
चलाये हे
फूल भुलाके
डारा खाँधा,भौंरा सन पगलाये हे ।
बान अनंग
चलाये हे।।
लाज कान सब बेंच
डरे हे,भौंरा मन रट्ठाये हे ।।
बान अनंग
चलाये हे ।।
बाग बगीचा खेत
खार मा,कुसुम कली पट्टाये हे ।
बान अनंग
चलाये हे ।।
पौंदर दसगे बन
काँदी केअंग अंग फगुनाये हे।।
बान अनंग
चलाये हे ।।
रहन सहन वधु
धरे संहिताडेहरी पाँव मड़ाये हे ।
बान अनंग
चलाये हे ।।
सतरंग होगे आस
बदरियालहसे माथ नवाये हे ।
बान अनंग
चलाये हे ।।
बाग बगइचा मा
मतंग हो ,तितली बाट भुलाये हे ।
बान अनंग
चलाये हे ।।
शोभामोहन
################
राजा ब इठे
गुनत महल मा
################
1/
राजा बइठे
गुनत महल मा,
संसो बूड़े भारी हे
।
बाट बिकट हे
जेमा जाना,
कर तलवार
दुधारी हे ।।
2/
बिखदाँती टोरे
बिखहर के,
गुपचुप करत
तियारी हे।
लोकसता के
चारो खंभा,
घुने खताय
दिंयारी हे ।।
राजा बइठे
गुनत महल मा.......
3/
घर देखै ते
बाहिर देखै,
दुविधा हे
लाचारी हे ।
रोग समझ मा
आवत सब ला,
दिन्नी गजब बिमारी
हे ।।
राजा बइठे
गुनत महल मा.............
4/
नीक कहत हें
खीख कहत हें,
बात चलत
चरियारी हे ।
कोन सकै
समझाये मूरख,
उलटा सीखा
जारी हे ।।
राजा बइठे
गुनत महल मा............
मार काट जे
धरम सिखोथे,
धरम नहीं वो
आरी हे ।
दूसर के होती
नइ मानै,
जानौ नीयत
कारी हे ।।
राजा बइठे
गुनत महल मा..........
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
चल न गड़ी
वृन्दावन जाबो.......
चल न गड़ी
वृन्दावन जाबो,
कान्हा रास
रचाथे रे ।
सब रउताइन मन
अधरतिया,
सँभर-सँभर के
जाथे रे।। चल न गड़ी ....
नंदराय के बने
पहटिया,
दिनभर गाय
चराथे रे ।
साँझ होत बरदी
उसला के,
जमुना घाट
नहाथे रे ।। चल न गड़ी .......
फेंक भँदइ
लउठी अउ खुमरी,
महाराज बन
जाथे रे ।
चंदन तिलक
लगाथे माथा,
कद पिंवरी
झमकाथे रे ।। चल न गड़ी ....
कनिहा करधन
कसे काछनी ,
सोना ढ़ीक
सुहाथे रे ।।
खाँध धरे पट
पीताम्बर ला,
रहि-रहिके
लहराथे रे ।। चल न गड़ी........
मछरी छाप
पहिरथे कुंडल,
मउर मकुट
खपवाथे रे ।
छाती भर
बैजंतीमाला,
मोती लर
लटकाथे रे ।। चल न गड़ी............
अत्तर छींचे
आनी-बानी,
महर-महर
ममहाथे रे।
मोर पंख ला
मूड़ सजाके,
बँसुरी नीक
बजाथे रे ।। चल न गड़ी........
सुनके दरसन
प्यास बढ़त हे,
जाथें तेन
बताथे रे ।
भाग जागथे
जेकर मनके,
तेने दरसन
पाथे रे ।। चल न गड़ी ..........
सब गोपी के
साध पुरोये,
अनगिन ठन बन
जाथे रे ।।
रास रंग
रंझाझर झुमरत,
बेर पहाती
आथें रे ।। चल न गड़ी............
ए गड़ी चल
वृंदावन जाबो,
बात महू ला
भाथे रे।
शोभामोहन के
रंगरसिया,
पिया सबो
सहराथे रे ।। चल न गड़ी.........
शोभामोहन
१२/०१/२०२०
चुपर भभूती साँप लपेटे, ध्यान मगन हो
सुख पाथे ।।
भोला भोला बोलत रहिबे, अउ प्रलयंकर हो
जाथे।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
[10/09/19 ]
मदनबान ला काट दिही जे, ओहर शंकर हो
जाही ।
मरी असन ओकर बर ये जग, हीरा कंकर हो
जाही।।
पानी ओइछ परघा
लानिन, बदले ओकर बानी हे।
एक पाग में
लगत पगाये, सबके रामकहानी हे।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
राम जपन ले
अलहन टरही (कुकुभ छंद)
1/
जिनगी भर बड़
उठापटक कर,
जोरत हस दू गज
तीखा ।
करू कसा ला
जबरन लीले,
अमृत पाय नइ अउ
चीखा।।
2/
पल म छूट जही
मेछरा झन,
जिनगी के
नाजुक डोरी।
पाप काटही लाग
नता मन,
करत नाहवन धर
ओरी।।
3/
जेन नता के
मानी पीथस,
लउहाही बन
कठियारा ।
अपन गरज सब
सुरता करके,
रोहीं-गाहीं
सतधारा।।
4/
लंबरदार लगाही
आगी,
भरभर-भरभर बर
जाबे।
दू दिन गाँव म
चर्चा होही,
पानी पाँच पसर
पाबे।।
5/
मूँड़ मुड़ा के छूत काटहीं,
खात-खवाई बड़
होही।
कलप-कलप सुख
सुरता करही,
ए जग मा छूटे
जोंही।
6/
हाड़ा-हपट
कमाये धन मा,
काँड़ी संग
नहीं जाही।
मन मुरकेटे
जोरे जोरन,
दूसर फुदर
फुदर खाही।।
7/
बेरा हावय
कतका बाँचे,
अगम बात न कहूँ
जाने।
राम जपन ले अलहन टरही,
अउ हो जाही मन
आने।।
शोभामोहन
[31/08/19/12:35]
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