*सुन्दरी सवैया*
प्रभु हा रचके
जग सुंदर ये अतका सुख साध रचाय रखे हे ।
अरझावत हे जड़
काम क्षुधा सपना मन ला बउराय रखे हे ।
बगरे अउ लालच
के चुगनी मति के गति ला छरियाय रखे हे ।
सुख भोग रमे चटिया
मटिया सबके शुभ ध्येय भुलाय रखे हे ।
कतको सुख भोग
छके नइ हे मन ला तिसना दँउड़ाय रखे हे।
सब भोग बियावत
रोग तभो अँधरा बनके बिसराय रखे हे।
भकवाय भरे
भरका भुगते भयहारन ला बिसराय रखे हे।
अपने भर दोष न
देख सकै, अँगरी पर कोत उठाय रखे हे ।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
पाटन दुर्ग
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