Tuesday, 21 March 2023

चाम दाम के बन व्यापारी

गीत

चाम दाम के बन व्यापारी

एक सूर्य अंतस के नभ पर।
जन्मों से अस्ताचलगामी ।
इदमवृत्ति और ममवृत्ति में,
माया छाया के बन स्वामी।।
रोप रहे हैं पागलपन में,
कुम्हलाने वाली फुलवारी ।।
अँधियारे ने खूब निभायी,
जनम-जनम की रिश्तेदारी ।।

धन की परिभाषा जाने बिन,
खूब बटोरें कागज पत्थर।
धातु कीमती करके संचित
बैठे खुद चौंकीदारी पर।।
सिर के पत्थर पाँव पटककर
रोते बिलख बिलखकर भारी।
अँधियारे ने खूब निभायी,
जनम-जनम की रिश्तेदारी ।।

व्यर्थ बिताये इस जीवन पर,
खेद जताये ना नाराजी।
बार-बार दुख -सुख झेला पर,
पार गमन को हुए न राजी।।
सुख का सौदा करना चाहें
चाम दाम के बन व्यापारी ।।
अँधियारे ने खूब निभायी,
जनम-जनम की रिश्तेदारी ।।

एक मुहाना फिर भी ऐसा,
सौदा सच्चा खरा माल को।
जग दर्शन तटस्थ हो निज लख,
छिन्न-भिन्न कर इन्द्रजाल को।।
यह उपकार स्वयं पर करके,
छोड़ गिनाना अब लाचारी ।।
अँधियारे ने खूब निभायी,
जनम-जनम की रिश्तेदारी ।।

शोभामोहन श्रीवास्तव
अमलेश्वर रायपुर छ.ग.

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