गीत
चाम दाम के बन व्यापारी
एक सूर्य अंतस के नभ पर।
जन्मों से अस्ताचलगामी ।
इदमवृत्ति और ममवृत्ति में,
माया छाया के बन स्वामी।।
रोप रहे हैं पागलपन में,
कुम्हलाने वाली फुलवारी ।।
अँधियारे ने खूब निभायी,
जनम-जनम की रिश्तेदारी ।।
धन की परिभाषा जाने बिन,
खूब बटोरें कागज पत्थर।
धातु कीमती करके संचित
बैठे खुद चौंकीदारी पर।।
सिर के पत्थर पाँव पटककर
रोते बिलख बिलखकर भारी।
अँधियारे ने खूब निभायी,
जनम-जनम की रिश्तेदारी ।।
व्यर्थ बिताये इस जीवन पर,
खेद जताये ना नाराजी।
बार-बार दुख -सुख झेला पर,
पार गमन को हुए न राजी।।
सुख का सौदा करना चाहें
चाम दाम के बन व्यापारी ।।
अँधियारे ने खूब निभायी,
जनम-जनम की रिश्तेदारी ।।
एक मुहाना फिर भी ऐसा,
सौदा सच्चा खरा माल को।
जग दर्शन तटस्थ हो निज लख,
छिन्न-भिन्न कर इन्द्रजाल को।।
यह उपकार स्वयं पर करके,
छोड़ गिनाना अब लाचारी ।।
अँधियारे ने खूब निभायी,
जनम-जनम की रिश्तेदारी ।।
शोभामोहन श्रीवास्तव
अमलेश्वर रायपुर छ.ग.
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
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