जनम जनम के
रिक्त भुवन में
जब तुम पाहुन
बनकर आये ।
भूल गये
पहुनाई करना,
खोल दिये सब
गिरह लगाये।।
पगपूजन करने
को प्रियतम्
बरसे झम झम अँसुवन
क्योंकर।
नीरव नैनो ने
तुमसे मिल,
सपनों का
संसार सजाया ।
अंतस के
अँधियारे तल ने
किरण प्रेम का
पहला पाया।।
दाग देह की सब
बिसराये,
चहक रहा चंचल
मन क्योकर ।
समय अभी
अनुदार न बनना,
जब सिर चढ़
प्रियतम धुन बोले ।
साँसो हुई
सुगंधित अब जब,
प्राण पपीहा
अमृत घोले।।
सुखगैली में
संग पिया के,
हद ना भूले
धड़कन क्योंकर ।
चिर उदास धड़कन
को छूकर,
अंतस में
मधुरस बरसाते ।
बिन घर भटकी
वनबासिन को,
लाकर तुम अपने
आहाते ।।
मेरी प्यास
धरा जैसी पर,
बरसे ना प्रिय
सावन क्योंकर ।।
अहोरात के संग रंग में,
प्रेम चटख हो
गया हमारा।
सम लगते
सुख-दुख के अवयव
देख पिया का
मुखड़ा प्यारा।।
चरण धूलि से
माँग सजाकर,
महक रहा मन
चंदन होकर ।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
११/०६/२०१६
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