सतगुरु वंदना
सबके हाल बिहाल इहाँ हे, देखत हौं सरकार।
सतगुरु जीव लगा दे पार
सरग नरक धरती सबमें हे, माया के बिस्तार।
सतगुरु भवदहरा पतवार ।
इन्दर ब्रह्मा बनना चाहत, बल के करन प्रसार ।।
सतगुरु भव दहरा कर पार।
माया ठगिया तीन लोक में, राज करत जब झार।।
सतगुरु भव दहरा पतवार।
तोर शरन बिन मोर तरन नहीं, अब कर सोग उदार।
सतगुरु भव दहरा पतवार ।
जब तक मन तोर भाँवर देथे, चल देथौं दिख पार।
मन धनहा मा साध सधौरा, जामत खरपतवार।
बनन बनन गिंजरत दुख पावत, जुग जुग जीव हमार।
सतगुरु भव दहरा कर पार।।
लोभ मोह अउ रईस राँड़ मन, तपथें डेरा डार।
सतगुरु भव दहरा कर पार।।
बिसय मिलत बलकर होवत हे, दुर्गुण देह हमार।।
सतगुरु भव दहरा कर पार।।
पय पाखा मन घात लगाये, बिख उगले तैयार।
सतगुरु भव दहरा कर पार।।
तोर दया बिन साध मिटै नहीं, कर लौं उदिम हजार।
सतगुरु भव दहरा कर पार।।
शोभामोहन सँउपत हावय, तोर उपर सब भार।।
सतगुरु भव दहरा कर पार।।
शोभामोहन
२६/०५/२०२२
चरन सतगुरु के, चित्त रख रे(राग भूपाली)
चरन सतगुरु के, चित्त रख रे।
परमअलौकिक सबसुख चख रे।
चरन सतगुरु के, चित्त रख रे।
सतगुरु समरथ अलखलखैया,
सतगुरु समरथ अलखलखैया,
गुरुपगचिनहा चल हरि लख रे।।
चरन सतगुरु के, चित्त रख रे।
बाती तेल बिन दीपजलैया।
बाती तेल बिन दीपजलैया।।
लकलक होये सिख नख रे।
चरन सतगुरु के, चित्त रख रे।
शोभामोहन
१८/०२/२०२२
महुदा
गुरु वंदना
सतगुरु मोर बने डोंगहार।
भवदहरा गहरा तन बेड़ा।
उठत गरेरा खात थपेड़ा।।
अनुकुल करत बयार।
सतगुरु मोर बने डोंगहार।
दुलमजनम पाके मानुखतन।
भँउरी झेलै बनन बनन झन।।
देख बिगन पतवार ।
सतगुरु मोर बने डोंगहार।
घुपअँधियार उवाटत खतरा।
गुरुबर बनके चकमक पथरा।।
लानत झक उजियार।
सतगुरु मोर बने डोंगहार।
बाट न जानौं घाट न जानौं।
जग नहकैया हाट न जानौं।।
रहिथौं गुरु के भार।
सतगुरु मोर बने डोंगहार।
शोभामोहन
०७/०९/२०१९
शोभामोहन श्रीवास्तव (शोभा शर्मा या शुभ चंद्र सूर्या), पति ;- कवि मोहन श्रीवास्तव, प्रपौत्री ;-छतीसगढ़ के प्रसिद्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व् कवि पंडित सुन्दर लाल शर्मा, शैक्षणिक योग्यता ;- स्नाकोत्तर भाषा विज्ञानं , ३)ऋग्वेद प्रथम मंडल , पंचम मंडल का संस्कृत मन्त्र छत्तीसगढ़ी में छंदमय भाष्य हिंदी भावार्थ सहित (प्रकाशनाधीन ), लगभग १० पुस्तकों में कुछ प्रकाशित और कुछ प्रकाशनाधीन
Tuesday, 21 March 2023
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