/नइ डर लागै का तोला
भवदहरा के
माँझ धार मा,
फँसे हवय
चोला। नइ डर लागै का तोला।
मलकत हावय
फुटहा ड़ोगी,
बइठे बन भोला । नइ डर लागै का
तोला।
रटहा डारी बइठ
कोइली,
नीयत डरेस
डोला । नइ डर लागै का तोला।
लरा-जरा ले
मया पिरित बड़,
सग ले हस
अनबोला ।नइ लागय का तोला।
डूमर कीरा कस
अनजाना,
आन जगत गोला ।
नइ डर लागै का तोला।
सबके आँखी
मुँदे टकर तस,
समझत हस ओला।
नइ डर लागै का तोला ।
जमराजा दूल्हा
बन लकठा,
आवत धर डोला ।
नइ डर लागै का तोला।
शोभामोहन बने
हेरौठा,
छोड़त सब टोला
। नइ डर लागै का तोला।
शोभामोहन
१२/०१/२०२०
रे मन हरि
सुमरन कर ना
**********************************
जग अरझे बरजे
हौं तैं झन,रोग बिसा धर ना ।
छोड़ सबो परपंचीपन
ला,हरि सुमरन कर ना।।
रे मन हरि
सुमिरन कर ना..................
घेरी-बेरी
घानी-मूँदी,फोकट झन पर ना।
कोनो अइसे
कोनो वइसे,तोला का करना।।
रे मन हरि सुमिरन
कर ना...............
ब्यापै नइ का
अलहन धरके,पशु जइसे चरना ।
मृगतृष्णा बर
निंदरत हावस,अंतस के झरना ।।
रे मनहरि
सुमिरन कर ना ..............
काबर तैं
मंजूर करे हस,बिसयन जग जरना ।
पाप पुन्न के
पटक मोटरी, अगर कहूँ तरना।।
रे मन हरि
सुमिरन कर ना ...............
************************************
शोभामोहन
श्रीवास्तव
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+----------किराये मन बैरी भटके-------------+
+----------------------------------------------------+
झटकारे ले
बिसयन के लर,किरनी कस चटके।
किराये मन
बैरी भटके......
लपटे झपटे
आनी-बानी,सँभर सँभर मटके।।
किराये मन
बैरी भटके ।।१।।
एक खेदार दूसर
आ धमकै,साध भँवा पटके ।
किराये मन
बैरी भटके....
साध-सधौरा नार-लमेरा, फर ओरी लटके।।
किराये मन
बैरी भटके ।।२।।
सत के फुलवा
डुँहड़ावै जब,धर डारी झटके ।
किराये मन
बैरी भटके....
लाभ हान के
सबो गणित ला, राखे हे रट के।।
किराये बैरी
मन भटके ।।३।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
रायपुर छ.ग.
किराये मन
बैरी भटके
झटकारे ले
बिसयन के लर,किरनी कस चटके।
किराये मन
बैरी भटके......
लपटे झपटे
आनी-बानी,सँभर सँभर मटके।।
किराये मन
बैरी भटके ।।१।।
एक खेदार दूसर
आ धमकै,साध भँवा पटके ।
किराये मन
बैरी भटके....
साध-सधौरा
नार-लमेरा, फर ओरी लटके।।
किराये मन
बैरी भटके ।।२।।
सत के फुलवा
डुँहड़ावै जब,धर डारी झटके ।
किराये मन
बैरी भटके....
लाभ हान के
सबो गणित ला, राखे हे रट के।।
किराये बैरी
मन भटके ।।३।।
●मन बैरी भटके विष्णुपद छंद●
झटकारे ले बिसयन कोती, किरनी कस चटके।
लपटे झपटे आनी-बानी,सँभर सँभर मटके।।
मन बैरी भटके ।।
एक खेदारत दूसर धमकै,साध भँवा पटके ।
साध-सधौरा नार-लमेरा, ओरी धर लटके।।
मन बैरी भटके ।।
सतफुलवा डुँहड़ावै जब तौ,धर डारी झटके ।
लाभ-हानि के सबो गणित ला, राखे हे रट के।।
मन बैरी भटके।।
बिख बुताय बेधाय बान हा,चिटको ना खटके।।
गिंजर बजरिया दृश्य लहरिया,आँखी जा अटके ।।
मन बैरी भटके ।।
शोभामोहन
●रे मन हरि सुमरन करना (विष्णुपद छंद)●
जग अरझे बरजे
हौं तैं झन,रोग बिसा धर ना ।
छोड़ सबो
परपंचीपन ला,हरि सुमरन कर ना।।
हरि सुमिरन कर
ना.................
घेरी-बेरी
घानी-मूँदी,फोकट झन फिर ना।
कोनो अइसे
कोनो वइसे,तोला का करना।।
हरि सुमिरन कर
ना...............
ब्यापै नइ का
अलहन धरके,पशु जइसे चरना ।
मृगतृष्णा बर
निंदरत हावस,अंतस के झरना ।।
हरि सुमिरन कर
ना ..............
काबर तैं
मंजूर करे हस,बिसयन जग जरना ।
पाप पुन्न के
जबर मोटरी,फिकर नहीं कर ना।।
हरि सुमिरन कर
ना ...............
शोभामोहन
●पशुपन उपरित करे मनुख ला विष्णुपद●
ज्ञान धरा
विज्ञान बियावन, वेद लिखाय रहे।
पशुपन उपरित
मनुख करे बर,शास्त्र बनाय रहे ।
बेद बचन बड़
गूढ़ हवै गुन,अउ अरथाय रहे ।
गढ़े उपनिषद
सार वेद के,गुन ल बताय रहे ।।
अकबकाय झन
चकचकाय झन, अउ समझाय रहे।
गीता मा सब
सार डार के,अउ दुहराय रहे ।।
नानिक नाम
धराये सुमिरे, जीभ पिरावत हे।
जौंरा भौरा
बेरा कौंरा, जीव बन जावत हे।।
शोभामोहन
**************
●करमदंड भुगते बर परही विष्णुपद●
काया माया गरब
बूड़ के, शेर असन गरजे ।
धरे मोर धन
कहे रपोटे, नइ माने बरजे।।
पाप कमाई फल ल
पोगरी, भोगे बर परही ।
पर के बाना मारे
हावस, रचे पाप खरही।।
करमदंड भुगते
बर परही, चुप पीरा सहिके।
बोचक नइ पावस
रे हंसा, ओ घेरा रहिके।।
ग्यानी ला नइ
बरै गुनै ते, का तोला गुनही ।
पाप करम के फल
देये बर, पोनी कस धुनही।।
बिरथा जग मा
ओंड़ा देके, प्रभु ला नइ सुमरे ।
घानी फाँदे
बइला जइसे, बिन थिराय घुमरे ।।
दोष लगाके अब
कोनो ला ,काँही झन कहिबे।
मन के खार ल
चतवारे बर, उदीम करत रहिबे।।
शोभामोहन
●तोर चरन ले निकले गंगा -विष्णुपद●
तोर चरन ले
निकले गंगा,सबके पाप हरे ।
चरन धरइया के
चंचलपन अउ सब बिपत टरे ।।
तोर चरन के
अनुरागी मन,छेंवें छेंव चलै।
तोर दया छँइहा
मा रहिके,फूलै अउ फलै ।।
तीन कदम मा
तीन लोक ला,पल मा नाप डरे ।
राजा बलि के
ताप नवा के,मन मा भक्ति भरे ।।
तोर चरन सेवा
कर लक्ष्मी,धनिक कुबेर करे ।
तोर चरन मा
ध्यान लगइया,भव अथाह उबरे ।।
शोभामोहन
विष्णुपद छंद
अभ्यास
१/
काया माया
नगरी डगरी, अरझाही भोला।
मोर-मोर कहि
गाठँ बाँध झन, ये बस्ती टोला।।
२/
संतन नइ
बाँचिन माया ले, का गुनही तोला ।
जुच्छा आना
जाना जानत, भर डारे झोला।।
3/
कोन दिही सुख
सबके भीतर, हे आगी गोला।
हुसियारी मा
बात बिगड़ही, तज दे अब ओला।।
4/
बिरथा जग मा
ओंड़ा झन दे, हो जा अनबोला ।
शोभामोहन अलख
जगा ले, आवत ले डोला।।
श्याम चले तैं
ले बाँसुरिया (विष्णुपद छंद )
श्याम चलै तै
ले बाँसुरिया
कान म धुन
झनके ।
अलथी-कलथी रात
पहावत,
सुध बुध नइ तन
के।।
साध जरइ दू
पाना होवत,
गाज गिरिस झम
ले ।
लउकत हे बिजली
कस मुहरन,
सुध घन घमघम
ले ।।
गाँव गुड़ी घर
पनघट नदिया
गत नइ मधुबन
के ।
श्याम चले तैं
ले बाँसुरिया,
कान म धुन
झनके ।।
माखन लोंदी कस
मन टघलत,
अउ बोहावत हे
।
भाव नदी के
बइहा पूरा,
टोंटा आवत हे
।।
मया मोह हर
झूलत हवै,
गरफाँसी बनके
।
श्याम चले तैं
ले बाँसुरिया,
कान म धुन
झनके ।।
मुठ मारे कस
रूख सुखागे,
चुपचुप चुरगुन
हे ।
काय मोहनी
डारे सबला,,
बस तोरे धुन
हे ।।
सब मन मंदिर
तँही बिराजत,
जिनगीधन बनके
।
श्याम चले तैं
ले बाँसुरिया,
कान म धुन
झनके ।।
गोपी ब्याकुल
ग्वाला ब्याकुल,
अउ जसुदा मइया
।
ब्याकुल हावय
नंद गँउटिया
अउ बछरू गइया
।।
नइ आवस तौ हमी
आत हन,
उड़त सुआ बन के
।
श्याम चले तैं
ले बाँसुरिया,
कान म धुन
झनके ।।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
खुश्बूविहार
कालोनी पाहन्दा
६/नइ भटकन
चौरासी
मनखे करम
निहारत प्रभु ला,
आवत हावय
हाँसी ।
फेर मरन नइ
फेर जनम नइ,
नइ भटकन चौरासी।२
मइलाये अंतस
ला धोये,
बनबो ईश उपासी
।।२ नइ भटकन...........
लोभ मोह माया
अहमइती,
जीयत मर नइ
छूटे।२
चोला चुटकी
चूरी जइसे,
चुटले चुटके
टूटे ।।२
सबो लमाये
लाटा-फाँदा,
बन हावय
गरफाँसी।२ नइ भटकन..........
बिरवा वो
हरियाथे जेकर,
थाम्हन पाथे
पानी।२
तइसे अंतस
किरवारे बिन,
बिरथा ए
जिनगानी।।२
गरब भरे पन आही-जाही,
काया परही
साँसी ।२ नइ भटकन............
शोभामोहन
०२/०८/१९
दुख बिसरावौं सब
सुख पावौं, राम सिया गावौं।
अलख जगावौ लगन
लगावौं, पँउरी तज नइ जावौं।।
७/भजन कर भटका
झन चोला
भजन कर भटका
झन चोला ।
काया माया
नगरी डगरी, अरझाही तोला।
भजन कर भटका
झन चोला ।
मोर मया ममता
अगराही, जग बस्ती टोला।
भजन कर भटका
झन चोला ।
संत गुनी
बाँचे नइ पाइन, का गुनही तोला ।
भजन कर भटका
झन चोला ।
जोरन-भारन जाय
नहीं अउ, भर डारे झोला।
भजन कर भटका
झन चोला ।
कोन दिही सुख
सबके भीतर, हे आगी गोला।
भजन कर भटका
झन चोला ।
हुसियारी मा
बात बिगड़थे, तज देबे ओला।
भजन कर भटका
झन चोला ।
जग के बात
सुने होगे हे, प्रभु हर अनबोला ।
भजन कर भटका
झन चोला ।
शोभामोहन अलख
जगा ले, आवत ले डोला।
भजन कर भटका
झन चोला ।
शोभामोहन
श्रीवास्तव
१२/०१/२०२०
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